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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

येनाङ्गदत्वं नास्तीति बुद्धं हेमाङ्गदेन वै । अङ्गदत्वं कुतस्तस्य तस्य शुद्धैव हेमता ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव द्वारा अज्ञानउपहित ब्रह्म जिस जिस स्वरूप से ज्ञात होता है भ्रान्ति से अथवा स्मृतिपरम्परा से उसके स्वभाव का ही अवलम्बन कर उसकी स्वभावत्वेन भावना करता हुआ वह स्वरूप कालान्तर में उस आकार से "वही यह है" यों तत्ता से युक्त पदार्थ सा अवभासित होता है, उसकी ही जीवने अपने में स्मृतिरूप से कल्पना की है