Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
चितः पाषाणकाष्ठत्वं स्वप्नादिषु कथं भवेत् ।
इदं पाषाणकाष्ठादि कथं नास्त्यस्ति वा कथम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे उसकी चिन्मात्रता की प्रसिद्धि है 2 इस पर कहते है ।
मननाकार की कल्पना के पूर्व वह चिन्मात्र ही था । मननाकार कल्पना के बाद "मन" इस नाम से
उसके चित्तादात्म्यअध्यास की कल्पना हुई । जैसे कि जल में ही आवर्त के (र्भवर के) विवर्त के आकार
से स्वयं उठकर उसने आवर्तता की कल्पना की