Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
शरीरस्य यथा केशनखादिषु यथाग्रहः ।
सर्वात्मनस्तथा काष्ठदृषदादौ तथाग्रहः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि पृथिवी आदि से रचा हुआ दिखाई दे रहा ब्रह्माण्डरूप विराट् शरीर पृथिवी
आदि से रहित कैसे हो सकता है ? इस पर कहते है।
जैसे मनोरथ के पर्वत का भलीभाँति दिखाई दे रहा, अनुभव में आ रहा, रूप पृथिवी आदि से रहित
है वैसे ही उसके विराट शरीर का रूप भी पृथिवी आदि से रहित है