Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verses 27–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verses 27–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 27-33
संस्कृत श्लोक
सर्गः स्वप्नः स्वप्न एव जाग्रद्देहः स एव च ।
घनं सुषुप्तं तैमिर्याद्यथा संवेदनं भवेत् ॥ २७ ॥
तस्य कल्पान्तरजनी शिरोरुहतयोदिता ।
प्रकाशतमसी कालक्रियाख्याः स्वाङ्गसंधयः ॥ २८ ॥
तस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः ।
चन्द्रार्कौ दृगू दिशौ श्रोत्रे कल्पनेति विजृम्भिता ॥ २९ ॥
एवं सम्यग्दृश्यमानो व्योमात्मा वितताकृतिः ।
अस्मत्संकल्पशैलाभो विराड् स्वप्नाकृतिस्थितः ॥ ३० ॥
यच्च चेतच्चिदाकाशे स्वयं कचकचायते ।
तदेतज्जगदित्येवं तेनात्मैवानुभूयते ॥ ३१ ॥
विराडात्मैवमाकाशं भाति चिन्मयमाततम् ।
स्वभावस्वप्ननगरं नगनागमयात्मकम् ॥ ३२ ॥
अनुभवितैवानुभवं सत्यं स्वात्मानमप्यसन्तमिव ।
अनुभवतीयत्त्वेन स्वप्ननटः स्वप्नदेशमिव ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि संवित् सवत्सा की अगभूत हैँ तो वे उसके समान ही सदेव क्यो स्फुरित नहीं होतीं 2 इस प्रश्न
पर कहते हैं।
जो संवित् काकतालीय के समान कभी स्फुरित होती हैं उनका स्मृति नाम रक्खा गया क्योकि
उद्बोधक सामग्री सदा नहीं रहती कदाचित् ही रहती है । जैसे कि आपके ये हस्त, पाद आदि अंग जब
मन उनकी ओर आकृष्ट होता है तो स्फुरित होते हैं और जब उनकी ओर आकृष्ट नहीं होता तब
स्फुरित नहीं होते हे । सर्वात्मक सब संवित् वैसे ही आत्मा में ही स्थित हैं जैसे कि स्वप्न, इन्द्रजाल
आदि में मिथ्याभूत घट, पट आदि पदार्थ स्थित रहते है । उक्त प्रकार के भ्रमभूत स्मृति पदार्थ के मूल
का क्या विचार करते हैं। दृश्य का संभव न होने से अभ्रान्त तत्त्वज्ञानी प्रजापति को वास्तव में स्मृति
होती ही नहीं हे । तत्त्वज्ञानी प्रजापति पूर्व की तरह निर्विकार ही रहता हे । जगत् की स्थिति उसकी दृष्टि
से एकरस चिदाकाश स्वरूप है । किन्तु अज्ञानी की दृष्टि में इस समय यह दृश्य यथास्थित ही है। न मैं
अज्ञ के लिए मोक्षोपाय की कथा करता हूँ और न अज्ञानी के निश्चय के अनुसार तत्त्वज्ञानी की स्थिति
ही जानता हूँ लेकिन यह अवश्य जानता हूँ कि वह भाम्यवश साधन चतुष्टय को प्राप्त कर सन्देह से जब
जिज्ञासु होता है, गुरु द्वारा तब तक उसके लिए मोक्षकथा कही जाती है जब तक कि उसका दुश्यप्रपंच,
स्मृति और संस्मृति शान्त नहीं होती । जैसे अज्ञानी तत्त्वज्ञो की स्थिति को नहीं जानते वैसे ही हम
ज्ञानी भी अज्ञो के निश्चय को नहीं जानते हे, क्योकि तत्त्वज्ञानियों मे अविद्या, मूर्खता तथा विमोह का
अत्यन्त अभाव है । अज्ञानी के अन्दर स्थित निश्चय कदापि भी हम तत्त्वज्ञानियों की बुद्धि का गोचर
नहीं हो सकता जो जिसकी बुद्धि के गोचर नहीं है, उसका उसे कदापि अनुभव नहीं हो सकता । भला
बतलाइये तो सही रात्रि का अनुभव सूर्य को कैसे हो सकता है ?