Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
एवमाद्यः प्रजानाथो निराकारो निरामयः ।
चिन्मात्ररूपसंकल्पपुरवत्कारणोज्झितः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञात ब्रह्म के स्वभाव का परोक्षरूप से ही जो स्फुरण है वही यह स्मरण हे । तदनन्तर मेँ ब्रह्म हूँ इस
उपासना से पुनःपुनः अभ्यास करने से ब्रह्मारूप आत्मा ही उपासना का फलभूत बाह्य अर्थ सा होकर
उपासना से कल्पित आकार के समान भासता है