Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अजे संकल्पमात्रात्म चिन्मात्रव्योमदेहिनि ।
अहं त्वं जगदित्यादि यद्विभातं तदेव तत् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
भ्रमयुक्त अनुभव में (भ्रमज्ञान में) विद्यमान भी दृश्य (रज्जुसर्प, शुक्तिरजत आदि) भासित-सा होता
है वैसे ही स्मृति में भी व्यवस्था समझनी चाहिये | देखिये न अविद्यमान भी सर्वथा असत् भी मृगतृष्णा
उदितसी भासित होती ही है । इसका सबको अनुभव है