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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verses 23–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verses 23–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 23-26

संस्कृत श्लोक

चिच्चमत्कृतयो भान्ति याश्चिद्व्योमनि शून्यताः । एतास्ताः सर्गसंहारस्थितिसंरम्भसंविदः ॥ २३ ॥ अच्छं चिन्मात्रनभसः कचनं स्वयमेव तत् । स्वप्नाभं चित्ततामात्रं स एष प्रपितामहः ॥ २४ ॥ यथा तरङ्गस्तेनैव रूपेणान्येन वाऽनिशम् । स्फुरत्येवमनाद्यन्तः सर्गप्रलयविभ्रमः ॥ २५ ॥ चिद्व्योम्नः कचनं कान्तं यद्विराडिति शब्दितम् । भवेत्संकल्पपुरवत्तस्य कुर्यान्मनोऽपि वै ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्य सवात्मि में स्थित जो संवित्‌ स्फुरित होती हैं वे ही भ्रान्त अभ्यास की दढता से बद्धमूल होकर भ्रान्त अनुभव के समानविषयत्वरूप सादृश्य से स्मृतियाँ कही गई हैं। सर्वात्मा ब्रह्म मे काकतालीय के समान आकस्मिक उद्बोधक वश जिन संविदा का (चिद्वृत्तियों का) भान होता हे चित्‌ की अवयवभूत सी विषयतः परोक्ष होने के कारण विकृत भी स्वतः अपरोक्ष होने से अविकृत वे ही स्मृति के नाम से विख्यात की गई हे । सर्वात्मा का स्वांगभूत सद्रूप स्वतः अनुभव में जिस जिस रूप से स्फुरित होता है वह उस अभ्यास में आये हुए पदार्थ से सादृश्य होने के कारण विद्वान्‌ लोगों द्वारा स्मृति" कहा जाता हे । जैसे वायु का स्पन्दन व्यंजन (पंखा) आदि हेतु के प्राप्त होने पर भी तथा न प्राप्त होने पर भी होता हे वैसे ही उद्बोधक कारण के प्राप्त होने पर अथवा प्राप्त न होने पर भी वे अनुभववृत्ति से उपलक्षित ही संवित्‌ कालान्तर में स्मृति नाम से ख्यात की गई