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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

यथास्थितमिदं विश्वं ब्रह्मैवानामयं सदा । तत्त्वज्ञं प्रत्यतत्त्वज्ञजनतानिश्चयादृते ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त आशय को ही पुनः सूचित करते हुए समाधान का उपसंहार करते हैं। इसलिए प्रजापति की आद्य स्मृति कदापि नहीं हो सकती हे । शुद्धज्ञानरूप प्रजापति की साकारता (मूर्तता) ही कहाँ से होगी २।१५॥ पूर्वजन्म मे उपासनारूप अपनी जगत्‌ देहत्वभावना के द्वारा उपासना फल की सिद्धि के लिए मैं जगत्‌ देह हूँ ऐसा प्रजापति को अवश्य स्मरण करना चाहिये । लोक में प्रसिद्ध जो स्मृति है ( वह मेरी माँ है वह मेरी लड़की है इत्यादि स्मृति है) उसकी तरह वह स्मृति पदार्थ प्रमाजन्य हे ही नहीं, क्योंकि अन्य का लौकिक स्मृत्यर्थ माता, पुत्री आदि घर में हे, किन्तु मनोराज्यतुल्य उपासना का विषय नहीं है यह विषमता हे । कैसे नहीं है, इस अर्थ को सुनिये