Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
आकाशस्य यथा शून्ये शून्यतायां यथाग्रहः ।
सर्वात्मनस्तथा द्रव्ये द्रव्यतायां तथाग्रहः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यो नहीं हैं ? यह यदि पूछो तो आदि सृष्टि के आरंभ में कारण ही कोई नहीं है, इसलिए नही है ।
यदि कहो कि प्राक्तन (पहले का) प्रजापति ही आगे के प्रजापति का कारण है, सो भी नहीं कह सकते,
क्योकि वह द्विपरार्धरूप अपनी आयु के अन्त मे मुक्त हो गया, ऐसा कहते हैं।
हे महामते, प्राक्तन प्रजापति के मुक्त हो जाने के कारण पुनः देह, बुद्धि आदि के ग्रहण में कोई
कारण नहीं है । इस कारण नूतन प्रजापति को जगत् की रचना में सहायक न पूर्व स्मृति होती है और न
उसकी उत्पत्ति का ही संभव है