Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 42,43
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
भूताकाश के समान व्यापक शून्य चिदाकाश में भुवन, सूर्य,पर्वत आदि रूप
यह सारा दृश्य अपने स्वरूप का त्याग न करता हुआ जीवन्मुक्तो के जीवन पर्यन्तव्यवहार के योग्य
होकर स्थित हे । यथास्थित विशाल दिशाकालवाला जगत् अपने स्वरूप का त्याग न करता हुआ ही
अपने तात्त्विक स्वरूप का त्याग न कर रहे चिदाकाश के उदर में स्थित हे