Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
स्वप्नोचितः स्वप्नपुरे रूपतायां यथाग्रहः ।
सर्वात्मनस्तथा स्वप्नजाग्रदादौ तथाग्रहः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
संसार में स्थित तथा आवागमन के चक्कर में पड़े हुए जीवों की
तरह विदेहमुक्त पुरुषों के संसारस्मृति तथा पुनः देहलाभ नहीं ही होते, क्योकि उनकी अन्य देश में
अथवा अन्य काल में पुनरावृत्ति ही नहीं होती हे । इस विषय में “इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते" तथा "न स
पुनराव्तति" अर्थात् मुक्त पुरुष, इस मनुष्य जनमरूपी आवर्त में नहीं पडते हैँ । उसकी फिर यहाँ
पुनरावृत्ति नहीं होती, इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं