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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 143

एक सौ इकतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बयालीसवाँ सर्ग स्वप्नादि जगत्‌ का तत्त्व ब्रह्म है यह वर्णन करते हुए तत्त्वदृष्टि से जगत्‌बीज कर्म के अभाव का साधन |

25 verse-groups

  1. Verses 1–2मुनि महाराज ने कहा : हे व्याध, संभ्रान्त लोगों को भी भ्रम में डालने वाले वर्तमान उस महान्…
  2. Verses 3–5स्वप्न का क्या रहस्य है यह निश्चय करने के लिए परकाय में प्रविष्ट हुए आप क्या निश्चय करके…
  3. Verse 6इस प्रकार अपने और दुसरे के स्वप्नो को देखने से अन्वय-व्यतिरेकगतः परिक्षित शब्दार्थरूप जगत…
  4. Verse 7तब लोक मे सर्ग शब्द और अर्थ कैसे प्रसिद्ध है 2 इस प्रश्न पर कहते है। ये सर्ग शब्द और अर्थ…
  5. Verses 8–9यदि सर्ग शब्द और अर्थ प्रसिद्ध हैं तो सर्ग शब्द और अर्थ हैं ही नहीं यह आप कैसे कहते हैं,…
  6. Verse 10सिद्धान्तपक्ष में शरीर आदि की प्रसिद्धि ही नहीं है, ऐसा कहते है । कहाँ शरीर है, कहाँ हृदय…
  7. Verse 11तब सिद्धान्त में क्या है, ऐसा प्रश्न उठनेपर कहते हैं। सिद्धान्त पक्ष में वह अति निर्मल चि…
  8. Verse 12ईश्वर का और तत्त्वज्ञानियों का जगत्‌दर्शन कैसा है 2 इस प्रश्नपर कहते हैं। वह चिदाकाश (चिन…
  9. Verses 13–17जैसे स्वप्न में एकमात्र चित्‌ का ही नगररूप से भान होता है वहाँपर वास्तव में नगर आदि कुछ भ…
  10. Verse 18द्वैत और ऐक्य से शून्य की द्वैत ओर ऐक्य से स्थिति क्या कहीं देखी गई है ? ऐसा प्रश्न उठनेप…
  11. Verse 19तब तो ब्रह्म द्वैत ओर ऐक्य युक्त ही है, द्वैत ओर ऐक्य से वर्जित नहीं, इसपर कहते हैं। जो ए…
  12. Verse 20जैसे आत्मा एक स्वच्छ चिन्मात्रआकाश होकर भी स्वप्न में जाग्रत्‌ के समान प्रतीत होता है वैस…
  13. Verse 21यदि प्रश्न हो कि प्रलय और सुषुप्ति में इसका जगत्‌ स्थित नहीं रहता, इसलिए यह सदा एकत्वभाव…
  14. Verse 22मन द्वारा मनन का त्यागकर यदि देखा जाय तो कहींपर कभी भी न जगत्‌ था, न है ओर न होगा इस प्रक…
  15. Verse 23तब तो प्राक्तन कर्मो के अनुसार ही मन मनन करता है, अन्यथा नहीं करता, इसलिए अन्तोगत्वा कर्म…
  16. Verse 24जिनका अधिकार दिलानेवाले उपासना फल के अन्तर्गत ही सहसप्रिद्धं चतुष्टयम्‌“ इस न्याय से तत्त…
  17. Verse 25उन महात्माओं का न संसार है, न द्वैत है और न उनमें विविध कल्पनाएँ ही हैं । विशुद्ध ज्ञानरू…
  18. Verses 26–27कर्मशून्य वे महात्मा ब्रह्मा आदि कर्मवान के आत्मा कैसे हैं, ऐसी आशंका उपस्थित होनेपर उस स…
  19. Verses 28–31जिनकी दृष्टि से कर्म रहता है, उनको कहते हैं। जो लोग अज्ञानावृत होकर अपना ब्रह्मत्व नहीं ज…
  20. Verses 32–36ब्रह्म में अविद्या भी जीवउपाधि के अवच्छेद से ही है, शुद्ध में नहीं है, ऐसा कहते है । जहाँ…
  21. Verses 37–40सृष्टि के आरम्भ में किसी जीव के कर्म का सम्भव ही नहीं हे । पीछे अविद्या में स्थिति की कल्…
  22. Verse 41क्यो नहीं होते ? इसपर कहते हैँ । सृष्टि के सृष्टिरूप से बद्धमूल होनेपर प्राक्तन कर्मो की…
  23. Verses 42–43जहाँ यह सृष्टि सृष्टि ही नहीं हे, किन्तु ब्रह्म ही इस प्रकार सृष्टि के रूपसे स्थित है वहा…
  24. Verse 44कर्म जब है ही नहीं तब कर्मयुक्त बन्धन कहाँ ? अर्थात्‌ नहीं है, किन्तु अज्ञानप्रयुक्त ही ब…
  25. Verses 45–83केवल ज्ञान से वस्तु (कर्म) का नाश कैसे संभव है ऐसी शंका उठने पर कर्म वस्तु ही नहीं है, यो…