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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 28-31

संस्कृत श्लोक

प्रथमं यद्यथा भाति चित्त्वमस्ति तथेह तत् । तस्यैव नियतिः कालो देशादीत्यभिधा कृता ॥ २८ ॥ या नामाशु यथा भाति चेतनाकाशशून्यता । तया तथा वस्तुतया कार्यकारणताश्रिता ॥ २९ ॥ चिच्चमत्कारमात्रेऽस्मिन्सर्गाभे भावरूपिणि । पूर्वं भावाः प्रवर्तन्ते पश्चात्सर्गाभिधा विदः ॥ ३० ॥ शून्यतास्त्रिजगद्रूपास्तथा चिद्व्योमनि स्थिताः । अनन्याः पवने सौम्ये स्पन्दसत्ता यथा निजाः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिनकी दृष्टि से कर्म रहता है, उनको कहते हैं। जो लोग अज्ञानावृत होकर अपना ब्रह्मत्व नहीं जानते यानी मेँ ब्रह्म हूँ" ऐसा नहीं जानते किन्तु “मैं ब्रह्म नहीं हूँ” यों ब्रह्म से अपने को भिन्न समझते हैं वे असात्तिक (केवल सत्त्व गुण के परिणाम से विलक्षण रजोगुण तमोगुण मिश्रित सत्व के परिणाम से उत्पन्न हुए) जीव अचित्‌ (अचेतन) नामक दवेत को सत्य जानकर उस वासना से वासित अन्तःकरणवाले होकर ही पहले मरे उनका कर्म सहित जन्म उत्तर काल में दिखाई देता है, क्योकि उन्होने स्वयं ही अचेतन देहात्मरूप होकर परमार्थ वस्तु को भूलकर अवस्तु को अपनाया | जिन महापुरुषों को बोधरूप महान्‌ आत्मा में ब्रह्म से भेद का कदापि बोध नहीं हुआ, कर्मबन्धनरूप दोष से रहित वे ये ब्रह्मा, विष्णु, हर आदि हैँ । सर्वात्मरूपसंवित्‌ की स्वच्छता स्वाभाविक है, सर्वात्म ब्रह्म स्वस्वभाव में ही स्थित है । वह कहीं मलिन उपाधि में स्वयं अपना जीववत्‌ भान देखता है