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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

सर्गो विद्यत एवायं न यत्र किल किंचन । तस्य धर्माणि कर्माणि न चैवाक्षरमालिका ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब लोक मे सर्ग शब्द और अर्थ कैसे प्रसिद्ध है 2 इस प्रश्न पर कहते है। ये सर्ग शब्द और अर्थ परमात्मा में यथार्थरूप से अज्ञात होकर ही प्रसिद्ध है अर्थात्‌ अज्ञात परमात्मरूप ही सर्ग शब्द और अर्थ हैं। शंका : अज्ञात यदि होते तो जबकि जगत्‌ अज्ञानमात्र होता, किन्तु वह अज्ञात आत्मपद शवल होने के कारण अज्ञान-ज्ञानरूप है । समाधान : हाँ, ऐसा ही होता जबकि जगत अज्ञानमात्र होता, किंतु वह अज्ञात आत्मपद शबल होने के कारण अज्ञान-ज्ञानरूप हे । अज्ञानांश को लेकर सर्ग शब्द और अर्थ अज्ञात हैं ओर ज्ञानांश को लेकर प्रसिद्ध हैं, ऐसा कहना समुचित है