Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
ब्रह्म प्रोद्भूय मृत्वा च दृश्यानुभवरूपि च ।
चिन्मात्रमजरं शान्तमेकमेवामलं स्थितम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि प्रश्न हो कि प्रलय और सुषुप्ति में इसका जगत् स्थित नहीं रहता, इसलिए यह सदा
एकत्वभाव है, यह कैसे ? केवल अदर्शनमात्र से जगत् उस समय नहीं रहता यह निर्णय नहीं किया
जा सकता, ऐसा कहते हैं ।
जैसे नेत्रं से अदृश्य वायु में अदृश्य सुगन्धि स्थित है, यह प्राणज अनुभूति से प्रतीत होता है वैसे ही
अमूर्त होने से प्रतिघात के अयोग्य चिन्मात्र में अमूर्तं जगत् स्थित है सुषुप्ति ओर प्रलय का अनुभव
करनेवाले पुरुष द्वारा अदृश्य भी जगत् अन्य पुरुषों की दृष्टि से दृश्य ही हे