Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 3–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 3-5
संस्कृत श्लोक
पाताले भूतले स्वर्गे सुखमैश्वर्यमेव वा ।
न तत्पश्यामि यन्नाम पाण्डित्यादतिरिच्यते ॥ ३ ॥
पण्डितस्य यथाभूता वस्तुदृष्टिः प्रसीदति ।
दृगिवेन्दौ निरम्भोदे सकलामलमण्डले ॥ ४ ॥
इदं दृश्यमविद्यात्म ब्रह्म संपद्यते क्षणात् ।
बुधस्य बोधात्स्रग्दाम सर्पत्वमिव शाम्यति ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न का क्या रहस्य है यह निश्चय करने के लिए परकाय में प्रविष्ट हुए आप क्या निश्चय करके
निवृत्त हुए, यो व्याध प्रश्न करताहै।
व्याध ने कहा : हे मुने, स्वप्न का तत्त्व क्या होगा इस प्रकार के सन्देह की निवृत्ति के लिए आप
उसके हृदय में प्रविष्ट हुए थे, सो क्या आपने स्वप्न का निश्चय कर लिया था ? भगवन्, यह आपने क्या
देखा ? हृदय में महासागर कहाँ रह सकता है, पेट में प्रलयकाल का वायु कैसे ओर हृदय में प्रलयकाल
की अग्निका कैसे संभव है ? द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ, दिशाएँ आदि रूप जगत्
का हृदय में केसे संभव है, इन सबका यथार्थ तत्त्व, जो आपने निर्णय किया हे, मुझसे कहने की कृपा
कीजिये