Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
सर्वेषामेव धर्माणां कर्मणां शर्मणामपि ।
पण्डितः पुण्डरीकाणां मार्तण्ड इव मण्डनम् ॥ १ ॥
आत्मज्ञानविदो यान्ति यां गतिं गतिकोविदाः ।
पण्डितास्तत्र शक्रश्रीर्जरत्तृणलवायते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनि महाराज ने कहा : हे व्याध, संभ्रान्त लोगों को भी भ्रम में डालने वाले वर्तमान उस महान् कष्ट
में आँधी द्वारा इधर-उधर बहाया जा रहा मैं अत्यन्त खेद को प्राप्त हुआ । तदुपरान्त खेद से मैंने सोचा
कि दूसरे प्राणी के हृदय में निवास कर रहे मेरा यह स्वप्न है, इसलिए मैं व्यर्थ में दुःस्वप्नदुःख क्यों
देखूँ ? दुःस्वप्नप्रदर्शन का त्याग कर जाग्रत द्वारा आनन्द क्यों न लूँ ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ इकतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बयालीसवाँ सर्ग स्वप्नादि जगत् का तत्त्व ब्रह्म है यह वर्णन करते हुए तत्त्वदृष्टि से जगत्बीज कर्म के अभाव का साधन |