Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 32–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verses 32–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 32-36
संस्कृत श्लोक
व्योम्नि सौषिर्यनैबिड्यं यथा नीलमिति स्थितम् ।
चिति चेतननैविड्यं तथा सर्ग उपस्थितम् ॥ ३२ ॥
आभात एव भातेऽस्मिन्कृच्छ्रात्सर्गे विसर्गता ।
बुध्यते रज्जुभुजगे रज्जुरूपं यथा पुनः ॥ ३३ ॥
मृतः स स्वप्नवत्सर्वः संपश्यति पृथग्जगत् ।
तच्चान्यदिदमन्यच्च नित्याप्रतिघमम्बरम् ॥ ३४ ॥
व्याध उवाच ।
परतः सुखदुःखार्थं देहः संपद्यते कथम् ।
किमस्य हेतुः के वास्य हेतवः सहकारिणः ॥ ३५ ॥
कुर्वन्ति धर्माधर्माश्चेत्तेन प्रतिघरूपिणा ।
तदस्याप्रतिघं रूपं कुर्वन्तीत्यसमञ्जसम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म में अविद्या भी जीवउपाधि के अवच्छेद से ही है, शुद्ध में नहीं है, ऐसा कहते है ।
जहाँपर उसे अपने जीवत्व का भान होता है वहीं अविद्या रहती हे, वर्हीपर आत्मा अपने
यथास्थित स्वरूप को संसार नाम से धारण करता हे । काल पाकर स्वयं ही अपने असली स्वरूप
को जानकर स्वयं स्वरूपस्थ ब्रह्म ही हो जाता है, कारण कि (ब्रह्म वा इदमग्र. ˆ (यह पहले ब्रह्म ही
था, उसने आत्मा को मैं ब्रह्म ह" यों जाना इससे वह सवत्मा हो गया) और ब्रह्म वेद” (जिसे
ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । जैसे द्रवरूप होने से जल
अपने अन्दर आवर्तरूपता को (भँवररूपता को) मानों प्राप्त होता हे वैसे ही ब्रह्म भी चित् होने से
सर्गरूपता को मानों प्राप्त होता है, क्योकि ब्रह्म का सर्ग स्वभाव ह । यह सर्ग (सृष्टि) ब्रह्मभान हे ।
न स्वप्न है ओर न जागरण हे । किसकी कौन सर्गता है तथा कौन किस प्रकार से अथवा कितने कर्म
ही हैं। वास्तव में कर्म हे ही नहीं, न अविद्या है और न सृष्टिबुद्धि ही है, किन्तु स्वसंकल्पवश यह
असत् ही यों प्रथित होता है । सर्वशक्तिमान् ओर सत्यसंकल्प होने के कारण ब्रह्म ही सृष्टि,
भूतस्वरूप, कर्म ओर जन्म ऐसी कल्पनाएँ करता हुआ स्वयं ही कल्पित पदार्थो के रूप से भासित
होता हे