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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

कार्यकारणतार्थानां या यथा हृदि कल्पिता । ब्रह्मणा पुरुषेणेव नगर्यन्तस्तथैव सा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

मन द्वारा मनन का त्यागकर यदि देखा जाय तो कहींपर कभी भी न जगत्‌ था, न है ओर न होगा इस प्रकार निरन्तर ही आत्मा अद्वितीय सुस्थिर है, ऐसा कहते है । समस्त मनन का (मनोव्यापार का) त्याग करनेपर तो तुम वस्तुतः जो निरामय सन्मात्र हो, वही हो । बाहर भीतर सर्वत्र अनन्त आत्मरूप से निरन्तर स्थित हो