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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 13–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verses 13–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 13-17

संस्कृत श्लोक

सर्गादावथ देहान्ते भान्ति स्वप्नार्थवन्मिथः । यथासंवेदनं जीवाः सन्तोऽसन्तश्च तेन ते ॥ १३ ॥ यथासंवेदनं सर्वे भान्ति भावयतस्ततः । ते सन्त्यात्मन्यपि स्वप्ने जाग्रतीवार्थदा मिथः ॥ १४ ॥ संकल्पसंविदग्रस्थवस्तुनिष्ठतयाऽस्फुटम् । फलं चाप्नोति ते स्वप्ने लोकनिष्ठतयाऽस्फुटः ॥ १५ ॥ शुद्धा संवित्स्वभावस्था यत्स्वयं भाति भास्वरा । तस्या भानस्य तस्यास्य जाग्रत्स्वप्नाभिधाःकृताः ॥ १६ ॥ सर्गादावथ देहान्ते भातं यद्वेदनं यथा । तत्तथाऽऽमोक्षमेवास्ते तदिदं सर्ग उच्यते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में एकमात्र चित्‌ का ही नगररूप से भान होता है वहाँपर वास्तव में नगर आदि कुछ भी नहीं है वैसे ही आत्माकाश में शान्त अखण्ड अभान इस चिन्मात्र का ही जगत्‌-रूप से भान होता है | (शंका- तब मेरे सदश अल्पज्ञो या अज्ञानियों की दृष्टि में जगत्‌ का भान कैसे होता है ?) समाधान-जैसे दृष्टि मेँ तिमिर रोग होनेपर प्रकाशमय आकाश में बालोंका-सा गोला दृष्टिगत होता है वैसे ही तुम्हारी चिद्रूप दृष्टि में अज्ञानरूप तिमिर रोग होनेपर यह जगत्‌-भान होता है । हमारी दृष्टि में तो न भान है, न प्रातिभासिक जगत्‌ है, न व्यवहारिक जगत्‌ है और न भूताकाश है केवल निराकार अनादि अनन्त (अविनाशी) चिदाकाश ही है। जिस कारण से केवल त्रिपुटी रहित (द्रष्टा, दर्शन, दृश्य रहित) शुद्ध द्रष्टा का ही बिना किसी कारण के नगर आदि के रूप से स्वप्न में भान होता है, यह स्वप्न में निर्णय किया गया है, उस कारण से जाग्रत में भी कारण के अभाव का पहले उपपादन किया गया है, अतः जाग्रत्‌ में भी न द्रष्टा है और न दर्शन है यानी द्रष्टा आदि त्रिपुटी है ही नहीं । स्वयं स्पष्टरूप से अनुभूत होनेपर भी कुमारी के सुख की तरह जिसका वर्णन करना असंभव है, अनादि अनन्त एक (अद्वितीय) द्वैत और ऐक्य से शून्य उस शुद्ध चिन्मात्र का ही जगत्रूप से भान होता है