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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 37–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verses 37–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 37-40

संस्कृत श्लोक

मुनिरुवाच । धर्माधर्मौ वासना च कर्मात्मा जीव इत्यपि । पर्यायशब्दभारोऽत्र कल्प्यते न तु वास्तवः ॥ ३७ ॥ चित्त्वात्कल्पितचित्त्वेन स्वयं चिन्नभसात्मनि । कृतानि नामान्येतानि कश्चिदस्तीति चेतसा ॥ ३८ ॥ संविदात्मा स्वयं चित्त्वाद्देहं वेत्ति खमेव खे । मृत्वा सन्तं सन्तमिव संकल्पस्वप्नयोरिव ॥ ३९ ॥ स्वयं स्वप्न इवाभाति मृतस्य परलोकधीः । तमेव पश्यति चिरं न तत्राप्यस्ति सत्यता ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

सृष्टि के आरम्भ में किसी जीव के कर्म का सम्भव ही नहीं हे । पीछे अविद्या में स्थिति की कल्पना के बाद चिद्रूप वह जीव देह आदि द्वारा स्वकर्म को स्वयं निष्पन्न कर उसका भोग करता है । भला बताइए तो जलावर्त का (जलके भँवर का) क्या शरीर है, क्या कर्म है ? जैसे भँवर केवल जल ही है वैसे जगत्‌ केवल ब्रह्ममात्र ही हे । आदि में शुद्ध देखे गये मनुष्यों का प्राक्तन कर्म नहीं होता है वैसे ही सृष्टि के आदि में शुद्ध सात्विक शरीर में चिन्मात्र स्वरूपवाले जीवों के कर्म नहीं रहते