Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
अग्न्यौष्ण्ययोरिव तथा वातस्पन्दनयोरिव ।
द्रवाम्भसोरिवाऽऽवीचि वा शैत्यानिलयोरिव ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो ब्रह्म द्वैत ओर ऐक्य युक्त ही है, द्वैत ओर ऐक्य से वर्जित नहीं, इसपर कहते हैं।
जो एक की दृष्टि में महान दीवाररूप है, वह दूसरे की दृष्टि में निर्मल आकाश रूप है यह बात
चिरस्थायी स्वप्न, मनोरथ, भ्रान्ति आदि में देखी गई है। यदि ब्रह्म परमार्थरूपसे द्वैत और ऐक्य युक्त
होता तो सबके प्रति वैसा दिखाई देता, किन्तु सब उसको वैसा देखते नहीं, यह भाव है