Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सर्वमप्रतिघं शान्तं जगज्जातमसन्मयम् ।
इत्थं सन्मयमेवास्ति नास्त्यर्थेन च संयुतम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
आत्मा एक स्वच्छ चिन्मात्रआकाश होकर भी स्वप्न में जाग्रत् के समान प्रतीत होता है वैसे ही जाग्रतमय
स्वप्न में भी प्रतीत होता है, अणुमात्र भी स्वप्न से जाग्रत में अन्यथा नहीं प्रतीत होता, उसी तरह इस
समय में भी उसकी अद्वितीयता ही है