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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 94

45 verse-groups

  1. Verses 1–4तिरानबेवाँ सर्ग चौरानबेवाँ सर्ग चित्त का परित्याग करने के लिए उसके मूल की परिशुद्धि करने…
  2. Verses 5–6कुम्भ ऋषि उसीको कहते हैं। कुम्भ ने कहा : हे महाराज, वासना ही चित्त का स्वरूप है, यह जान ल…
  3. Verse 7तब क्यो उसका सब लोग सम्पादन नहीं करते, इस पर कहते हैं। मूर्ख के लिए तो चित्त का परित्याग…
  4. Verse 8राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, आपके वचन से चित्त का स्वरूप वासनामय तथा विविध उपद्रवोषपाद…
  5. Verses 9–11हे मुने, यह चित्त संसाररूपी सुगन्ध युक्त पुष्प और दुःखरूपी दाहजनक अग्नि है तथा जगत्‌ रूप…
  6. Verse 12उक्त अर्थ का विमर्श कर अनुवादपूर्वक उसका अनुमोदन कर रहे राजा शिखिध्वज उसमें उपपत्ति बतलात…
  7. Verse 13कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, शाखा, फल ओर पल्लवां से युक्त चित्तरूपी वृक्ष का अज्ञात आत्मा ही…
  8. Verse 14राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, चित्त का मूल क्या है, अंकुर क्या है और इसका कौन-सा खेत है…
  9. Verse 15कुम्भ ने कहा : हे महामते, अहमर्थ से - अज्ञातात्मा से उदित जो यह हृदयवेदनात्मक अभिमानी प्र…
  10. Verse 16परमात्मा की माया ही इस मायामय प्रपंच का खेत हे । चूँकि सब मायामय प्रपंच का खेत वह है, इसल…
  11. Verses 17–21उस अंकुर की ही वृद्धि से चित्तरूपी वृक्ष के रूप में परिणति होती है, यह कहते हैं । निर्विक…
  12. Verse 22अव शाखाओं के छेदन और मूल के छेदन मे उपाय पूछते हैं। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, चित्त…
  13. Verse 23शाखाओं के छेदन का उपाय बतलाते है । फल ओर स्पन्दन आदि से समन्वित विविध वासनाएँ ही चित्तरूप…
  14. Verse 24उक्त अर्थ का ही जीवन्युक्तो में लक्षणरूप से दिगृदर्शन कराते है। जिसका मन किसी विषय मेँ आस…
  15. Verses 25–26शाखाच्छेदन का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर पुरुष मूलोच्छेदन में योग्य हो जाता है, यह कहते है ।…
  16. Verse 27हे महाबुद्धे, मुख्यरूप से इस चित्तरूपी करंजवन का निःशेष मूल दाह कीजिए, ऐसा करने से अचित्त…
  17. Verses 28–29मूलदहन प्रसिद्ध अग्नि से नहीं हो सकता, इसलिए दूसरी अग्नि जानने की इच्छा से राजा पूछते हैं…
  18. Verses 30–32यद्यपि मैंने अपनी बुद्धि से बाह्य पदार्थो का तथा देह से लेकर अहंकार तक आध्यात्मिक पदार्थो…
  19. Verse 33अहंकार में जड़ता नहीं है, इस शंका का विवर्तत्व हेतु से निवारण कर रहे राजा शिखिध्वज: जड़ म…
  20. Verse 34उक्त ब्रह्माण्ड आदि जडवर्ग, अधिष्ठान सद्रूप से अन्य होने के कारण भी, असत्‌ है । आकाश में…
  21. Verse 35हे भगवन्‌, इस तरह अहन्तारूपी मल का परिमार्जन जान रहा भी मैं प्रत्यक्‌ एकरस जो साक्षियैतन्…
  22. Verses 36–38अव एकमात्र परिशेष से ही साक्षिवैतन्य का परिचय दिलाने की इच्छा कर रहे कुम्भ कहते हैं। कुम्…
  23. Verses 39–41हे मुने, यह असत्यस्वरूप और आत्मा के साथ तनिक भी सम्बन्ध न रखनेवाले मल को धो डालने में मैं…
  24. Verse 42*कूटस्थ होने से सत्य वस्तु कारण हो ही नहीं सकती, असत्य वस्तु कारण है“ यह कहना तो असत्यभूत…
  25. Verse 43जैसे अहम्भावरूप कारण से मन आदि रूप संसार का अंकुर कार्य उत्पन्न होता है वैसे अपनी बुद्धि…
  26. Verses 44–46इस प्रकार पूछे गये राजा ने बहुत देर तक अपनी बुद्धि से अन्वेषण कर यह निश्चय किया कि देहादि…
  27. Verse 47स्पष्टीकरण के लिए पूछे गये अर्थ का फिर अनुवाद करते हैं। सामान्यतः विषयज्ञान का स्वरूप ओर…
  28. Verse 48पूछे जाने पर राजा शिखिध्वज अपना अभिप्रेत बतलाते है । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, सामा…
  29. Verses 49–50ज्ञान के प्रति देह आदि की सत्ता कैसे कारण होगी, इस पर कहते हैं। असत्यरूप से भासित होनेवाल…
  30. Verse 51इस तरह पूछे गये कुम्भ - विषयाकार से ज्ञान की उत्पत्ति होती है, इस तरह का जो भ्रम राजा शिख…
  31. Verse 52प्रत्यक्ष उपलब्ध हो रहे देहादि का आप कैसे अपलाप करते हैं ? यों राजा शिखिध्वज पूछते हैं। र…
  32. Verse 53हे मुने, हाथ, पैर आदि से संयुक्त तथा क्रिया-फलरूप विलास आदि से समन्वित सदा हम लोगों से अन…
  33. Verse 54भ्रान्तिग्रस्त उपलब्ध हुए पदार्थों मेँ व्यभिचार होने के कारण एकमात्र उपलब्धि से दृश्य पदा…
  34. Verse 55बिना कारण के यह शरीररूपी कार्य नहीं रह सकता। जिस द्रव्य का बीज नहीं है उसकी उत्पत्ति कहाँ…
  35. Verse 56हे राजन्‌, बिना कारण के जो कार्य सामने सत्‌ की नाईं अनुभूत होता है उसे मृगतृष्णाजल के सदृ…
  36. Verse 57मिथ्याभ्रम से उदित हुए शरीर आदि को आप अविद्यमान ही जानिये, क्योंकि अत्यधिक यत्नशील मनुष्य…
  37. Verse 58तब क्या ये देह आदि वन्ध्यापुत्र की देह की नाई अत्यन्त असत्‌ ही होंगे, यह राजा शिखिध्वज आश…
  38. Verse 59"अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्‌* इत्यादि श्रुतिरूप प्रमाण होने से तथा वैसा ही विद्वानो…
  39. Verse 60इतिहास, अनुमान, आप्त पुरुषो की उक्ति तथा अनुगत स्थानसाम्यरूप हेतु आदि प्रमाण से इस शरीर क…
  40. Verses 61–64उसकी भी कोई सत्ता नहीं है, दोनों में एक ही न्याय समानरूप से लगता है, इस गूढ अभिप्राय से य…
  41. Verse 65गढ अभिप्राय को न समझ रहे राजा शिखिध्वज आशंका करते हैं। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुनीश्वर…
  42. Verse 66उसका भी कारण बतलाना अत्यन्त कठिन है, हम कह नहीं सकते, अनिर्वचनीय है, अतः उसकी भी असत्ता म…
  43. Verse 67यो देवानां प्रभवश्चोद्‌भवश्च विश्वाधिको रुद्रो महर्षि: । हिरण्यगर्भ पश्यत जायमानं स नो दे…
  44. Verses 68–69इस रीति से पितामह की भवनादि सर्गो में जो अर्थक्रियाकारिता का प्रतिभास है उसकी भी व्याख्या…
  45. Verse 70उक्त अर्थ का ही संग्रह कर उपसंहार करते हैं। हे भूमिप, मेरी कही गई युक्ति से चिति से व्यति…