Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
यस्योपलभ्यते किंचित्स्वरूपं कलनात्मकम् ।
असद्रूपं कथं तत्स्यात्प्रकाशः स्यात्कथं तमः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्यक्ष उपलब्ध हो रहे देहादि का आप कैसे अपलाप करते हैं ? यों राजा शिखिध्वज पूछते हैं।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, जिस पदार्थ का प्रत्यक्षात्मक कोई एक स्वरूप उपलब्ध हो रहा
है वह असत्स्वरूप कैसे है ? (सद्रूप से उपलब्ध हो रहे पदार्थ में असत् की प्रतिज्ञा विरुद्ध है - इसको
दृष्टान्त से भी बतलाते हैं।) आप कहिये तो, प्रकाश भला तम कैसे हो सकता है ?