Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 17–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verses 17–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 17-21
संस्कृत श्लोक
निश्चयात्मा निराकारो बुद्धिरित्येव सोच्यते ।
अस्य बुद्ध्यभिधानस्य याङ्कुरस्य प्रपीनता ॥ १७ ॥
संकल्परूपिणी तस्याश्चित्तनाममनोभिधा ।
जीवो मिथ्योपलम्भात्मा शून्यात्मा ह्युपलोपमः ॥ १८ ॥
स्तम्भः कायोऽयमेतस्य स्नाय्वस्थिरसरञ्जितः ।
देशान्तरेऽङ्कुरोद्देशे कालस्पन्दोऽस्य वासना ॥ १९ ॥
शाखायाश्चित्तवृक्षस्य दीर्घा दूरगतास्तताः ।
इन्द्रियाण्यल्पभोगाश्च भावाभावात्मयोनयः ॥ २० ॥
विटपौघा महान्तोऽस्य शुभाशुभफलाकुलाः ।
ईदृशस्यास्य चित्तस्य दुर्वृक्षस्य प्रतिक्षणम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
उस अंकुर की ही वृद्धि से चित्तरूपी वृक्ष के रूप में परिणति होती है, यह कहते हैं ।
निर्विकार निश्चयात्मक जो अनुभव है वही बुद्धि कही जाती है। इस बुद्धिनामधारी अंकुर की जो
संकल्पस्वरूप पीनता (स्थूलता) उत्पन्न होती है उसका चित्त और मन नाम पड़ा हुआ है। परमार्थतः
विकाररहित होने से सर्वविकारशून्यस्वरूप अतएव पत्थर की उपमावाला यानी पत्थर के सदृश तथा
मिथ्याभूत चित्त ओर चित्त के धर्मो के सम्बन्ध का जो साक्षी है वही इसका साक्षी है । इसका स्तम्भ
यानी मूल से लेकर शाखापर्यन्त मध्य-प्रदेश यह शरीर ही हे, जो कि नाडियों, हड्डियों और रसों-
(रक्तो ) से रंजित है । मूलस्तम्भप्रदेश से आगे प्रदेश में स्कन्ध, शाखा आदि के प्ररोह के लिए
अंकुरारम्भ करने की इच्छा होने पर वसन्तादिकाल की नाई तत्-तत् भोगप्रद कर्मो के परिपाक काल
में राग, द्वेष, प्रवृत्ति आदि अंकुर, पल्लव आदि के आकार में जोर से स्पन्दित होता है वह इसकी
वासना ही हे । इस चित्तरूपी वृक्ष की जो लम्बी-लम्बी दूर तक पहुँची हुईं विस्तृत शाखाएँ हैं वे तो
इन्द्र्यो है ओर जन्म-मरणात्मक हजारों अनर्थो के कारण शुभ ओर अशुभरूप फलों से परिपूर्ण जो
तुच्छ भोग हैं वे इसकी बड़ी-बड़ी अवान्तर शाखाएँ हैं | इस तरह के इस दुष्ट चित्तरूपी वृक्ष की
शाखाओं का प्रतिक्षण छेदन (विषयभोगो मे आसक्ति का छेदन) कर रहे आप उसके मूल को उखाड़
फेंक देनेवाले आत्मदर्शन में खूब प्रयत्न कीजिए