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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 9–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verses 9–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

संसृत्यामोदपुष्पस्य दुःखदाहानलस्य च । जगदब्जमृणालस्य मोहमारुतखस्य च ॥ ९ ॥ शरीरयन्त्रवाहस्य दृत्पद्मभ्रमरस्य च । अयत्नाच्चेतसस्त्यागो यथा भवति तद्वद ॥ १० ॥ कुम्भ उवाच । सर्वनाशोऽस्य यः साधो चेतसः संसृतिक्षयः । स एव चित्तसंत्याग इत्युक्तं दीर्घदर्शिभिः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुने, यह चित्त संसाररूपी सुगन्ध युक्त पुष्प और दुःखरूपी दाहजनक अग्नि है तथा जगत्‌ रूप कमल का मृणाल है, मोहरूपी वायु का आकाश है, शरीररूपी यन्त्र का चालक है और हृदयरूपी कमल का भ्रमर है । इसका अनायास त्याग जिस तरह होता हो, वह कहिये। कुम्भ ने कहा : हे साधो, अंकुर, शाखा, पल्लव आदि से युक्त मूलसहित इस चित्त का नाश ही संसार का भी नाश है, वही चित्त का सम्यक्‌ त्याग है। बाह्य पदार्थो के त्याग के सदुश केवल ममता की निवृत्ति चित्त का सम्यक्‌ त्याग नहीं है - ऐसा अपरिच्छिन्न आत्मदर्शियों ने कहा है