Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 25–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 25, 26
संस्कृत श्लोक
संप्राप्तकारी यः सोऽन्तर्लूनश्चित्तलतो भवेत् ।
चित्तद्रुमलताजालं पौरुषेण विकर्तयन् ॥ २५ ॥
यस्तिष्ठति स मूलस्य योग्यो निकषणे भवेत् ।
गौणं शाखाविलवनं मुख्यं मूलविकर्तनम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
शाखाच्छेदन का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर पुरुष मूलोच्छेदन में योग्य हो जाता है, यह कहते है ।
जो पुरुष अपने पुरुषार्थ से चित्तरूपी लताओं को कतरता हुआ स्थित रहता है वह मूल का उच्छेद
करने के लिए योग्य हो जाता है । चित्त की शाखाओं का छेदन करना तो गोण है ओर मूल का छेदन
करना प्रधान है, इसलिए आप मूल का उच्छेद करने में तत्पर हो जाइये