Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
जानन्नपीति भगवन्नहंत्वमलमार्जनम् ।
अन्तर्यज्ज्ञं न जानामि तेन तप्ये चिरं मुने ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भगवन्, इस तरह अहन्तारूपी मल का परिमार्जन जान रहा भी मैं प्रत्यक् एकरस जो साक्षियैतन्य है
उसको नहीं जानता यही कारण है कि हे मुने, मेँ अधिक दिन से सन्तप्त हो रहा हूँ