Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 1–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवं वदति वै कुम्भे चित्तत्यागं मुहुर्मुहुः ।
अन्तर्विचारयन्सौम्यो राजा वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
हृदयाकाशविहगो हृदयद्रुममर्कटः ।
भूयोभूयो निरस्तं हि समभ्येत्येव मे मनः ॥ २ ॥
जानामि चैतदादातुं मत्स्यं जाल इवाकुलम् ।
त्यागमस्य न जानामि चित्तं द्रव्य इवोत्तम ॥ ३ ॥
चित्तस्यादौ स्वरूपं मे यथावद्भगवन्वद ।
ततश्चित्तपरित्यागं यथावद्वद मे प्रभो ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
तिरानबेवाँ सर्ग
चौरानबेवाँ सर्ग
चित्त का परित्याग करने के लिए उसके मूल की परिशुद्धि करने पर
देह आदि वेद्य पदार्थो का बाध और तदनन्तर पूर्ण चिति का अवशेष यह वर्णन ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह चित्त के परित्याग का उपाय कुम्भ ऋषि
के बतलाने पर अपने अन्तःकरण में बार-बार विचार कर रहा वह सौम्य राजा शिखिध्वज यह वचन
बोला । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, हृदयरूपी आकाश का पक्षी ओर अन्तःकरणरूपी वृक्ष का
बन्दर यह मन बार-बार मेरे द्वारा दूर कर दिये जाने पर भी फिर समीप में आ ही जाता हे । हे उत्तम,
जाल जैसे व्याकुल मछली पकड़ लेता है वैसे ही इस चित्त को पकड़ लेना तो मैं जानता हूँ, परंतु इसका
त्याग मेँ द्रव्य की नाई इसमें मूर्तत्व का अभाव होने से, नहीं जानता | हे भगवन्, सबसे पहले तो आप
मुझसे चित्त का क्या स्वरूप (त्याग के योग्य निष्कृट सामान्यरूप) है, यह ठीक-ठीक कहिये । इसके
बाद हे प्रभो, चित्त के परित्याग की यथावत् विधि बतलाइये