Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 59
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
कारणेन विना कार्यं शरीराद्यस्थिपञ्जरम् ।
अविद्यमानमेवेदं विद्ध्यसंभवतो नृप ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
"अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्* इत्यादि श्रुतिरूप प्रमाण होने से तथा वैसा ही विद्वानों का
अनुभव होने से एवं कारण का निरूपण न होने से यह आपके द्वारा की गई आपत्ति इष्ट है, ऐसा
कुम्भ कहते हैँ ।
कुम्भ ने कहा : हे राजन्, शरीर आदि अस्थिपंजररूपी यह कार्य बिना कारण के ही अनुभूत हो रहा
है, इसलिए असंभव (किसीसे उत्पन्न न) होने के कारण इसे अविद्यमान ही जानिये