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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 30–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verses 30–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 30-32

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । मुने मया स्वया बुद्ध्या बहुशः प्रविचारितम् । यावन्नाहं जगन्नोर्वीवनमण्डलमण्डितम् ॥ ३० ॥ नाद्रेस्तटं न विपिनं न पर्णस्पन्दनादि च । जडत्वान्न च देहादि न मांसास्थ्यसृगादि च ॥ ३१ ॥ कर्मेन्द्रियाण्यपि न च न च बुद्धीन्द्रियाणि च । न मनो नापि च मतिर्नाहंकारश्च जाड्यतः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि मैंने अपनी बुद्धि से बाह्य पदार्थो का तथा देह से लेकर अहंकार तक आध्यात्मिक पदार्थोका अनात्मस्वरूप से तथा मिथ्यारूप से ज्ञान कर लिया है तथापि आन्तरिक आत्मतत्व का परिचय न होने से जड़ भी इस अहंकार में पुनः पुनः जो मुझे आत्मताभ्रान्ति हो रही है वह किसी तरह दूर नहीं होती और इसीसे मुझे विश्रान्ति नहीं मिल रही है, यह कहते हैं। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, मैंने अनेक बार अपनी बुद्धि से सारे जगत्‌ के विषय में अच्छी तरह विचार कर लिया है - मैं अहंकार नहीं हूँ और न पृथ्वी और उसके अन्तर्गत वनमण्डलादि से मण्डित जगत्‌ ही हूँ। जड़ होने के कारण मैं पर्वत का तट नहीं हूँ, वन नहीं हूँ, पत्र, स्पन्दन आदि नहीं हूँ, देहादि मैं नहीं हूँ, मांस नहीं हूँ, हड्डी नहीं हूँ और रक्त आदि भी मैं नहीं हूँ। मैं न तो कर्मेन्द्रिय हूँ और न ज्ञानेन्द्रिय हूँ। मैं मन नहीं हूँ, बुद्धि नहीं हूँ और जड़ होने के कारण न मैं अहंकार ही हूँ