Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
कथं करोमि मूलस्य निःशेषकषणं मुने ।
कुम्भ उवाच ।
वासना विविधाः शाखाः फलस्पन्दादिनान्विताः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
शाखाओं के छेदन का उपाय बतलाते है ।
फल ओर स्पन्दन आदि से समन्वित विविध वासनाएँ ही चित्तरूपी वृक्ष की शाखाएँ हँ । आसक्ति
के परित्याग द्वारा अनुद्बुद्ध की गयी वे वासनारूपी शाखाएँ भीतर सदसद् विचार जनित संवित्तिके बल
से विच्छिन्न हो जाती हैं