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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । असतो द्वीन्दुबिम्बादेर्न युक्तं कारणेक्षणम् । वन्ध्यातनयसर्वाङ्गमण्डनं कस्य राजते ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

तब क्या ये देह आदि वन्ध्यापुत्र की देह की नाई अत्यन्त असत्‌ ही होंगे, यह राजा शिखिध्वज आशंका करते हैं। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, असद्रूप दो चन्द्रबिम्ब आदि के कारण का न दिखाई पड़ना तो (०0) निमित्तभूत शरीर आदि वस्तुओं की सत्ता से स्वयं ज्ञान भी, सोना आदि गलाने की घरिया में निषिक्त धातुओं के द्रव की नाई, शरीर आदि आकार से उदित होता है, यह तात्पर्य है। युक्त ही है, क्या किसीके सामने वन्ध्यापुत्र के सारे अंगों में आभूषण शोभित होते हैं ?