Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 36–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 36-38
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
एतावन्मात्रकं वृन्दं यदि न त्वं महीपते ।
जडत्वात्तन्महाबुद्धे योऽसि तद्वद मेऽनघ ॥ ३६ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
चिन्मात्रमहमच्छात्मवेदनं विदुषां वर ।
यत्र भावाः स्वदन्ते ते निर्णीयन्ते च येन वा ॥ ३७ ॥
एवंरूपस्य मे लग्नं नूनं मलमकारणम् ।
सकारणं वाहमिति यत्पदं च न वेद्म्यहम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
अव एकमात्र परिशेष से ही साक्षिवैतन्य का परिचय दिलाने की इच्छा कर रहे कुम्भ कहते हैं।
कुम्भ ने कहा : हे निष्पाप, हे महीपते, आप यदि जड़रूप होने के कारण अहंकारपर्यन्त
दृश्यसमूहस्वरूप नहीं हैं तो हे महाबुद्धे, आप जिस रूप के हैं, उस रूप को मुझसे कहिये । राजा
शिखिध्वज ने कहा : हे विद्र, मैं उस चिन्मात्र स्वच्छ आत्मसंवेदन का स्वरूपभूत हूँ, जिस अज्ञातृत्व,
अभोक्तृत्व आदिरूप से प्रसिद्ध अवान्तर अवान्तर कोश परम्परा की अवधिभूत आनन्दैकरस
चिन्मात्रस्वरूप के रहते आनन्दशून्य शब्द आदि विषय आस्वादित होते हैं ओर जिसके बुद्धि वृत्ति
पर चढ़ जाने से शब्दादि विषयों में इष्टअनिष्ट विभाग निर्णीत होते हैं । विवेकदृष्टि से पर्यालोचन
करने पर एसे शुद्धस्वरूप मुझे देह आदि कोशो मेँ अहमभिमानरूप मल लग गया है वह सकारण है
या अकारण ? उसे मैं नहीं जानता और न परब्रह्म को ही जानता हूँ