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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 63

बासठवाँ सर्ग समाप्त तिरसठवांँ सर्ग रुद्ररूपता को प्राप्त हुए उस हंस को पूर्व -देहों का ज्ञान, उनकी शतरुद्रता तथा एकरूपता-इनका वर्णन ।

25 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, वह हंसपक्षी अनायास ही ब्रह्मदेव के आसनभूत कमलिनी के न…
  2. Verse 2वहाँ पर भगवान्‌ शंकर में ज्ञान, योग, एश्वर्य आदि सम्पूर्णं गुणों का आधिक्य देखने से उस हं…
  3. Verses 3–4हंस का यह रुद्रदेहधारण जन्मान्तर नहीं है, किन्तु अवशिष्ट प्रारब्ध से उपनीत इच्छा के कारण…
  4. Verses 5–9सारूप्य मुक्ति में यद्यपि जगत्‌ का संहार आदि करने का अधिकार नहीं हैः तथापि ज्ञान, ऐश्वर्य…
  5. Verses 10–11आत्मज्ञान से शून्य उस भिश्च में रम्यवस्तुओं में इदन्त्व (यह) या अहन्त्व (मैं) बुद्धि रखने…
  6. Verse 12क्योकि पीछे जो चमत्कृति चित्त में आरूढ होती है, वही पूर्व चमत्कृति को दबाकर विलसित होती ह…
  7. Verse 13परम सिद्ध होते हुए भी उस भिक्षुक को अशास्त्रीय मानस-क्रीडा में प्रवृत्ति होने पर अनर्थो क…
  8. Verses 14–27उन्हीं योनियों का कारणप्रदर्शनपूर्वक विस्तार से वर्णन करते हैं। तदनन्तर द्विज में अनुरक्त…
  9. Verse 28अतएव शास्त्रीय उपायों का अभ्यास ही सर्वश्रेष्ठ है, जो कि विरुद्ध अनेक जन्मो का व्यवधान हो…
  10. Verse 29यदि शंका हो कि तव तुल्ययुक्ति से अशुभ भी भावनाभ्यास शुभ भावनाभ्यास से व्यवहित होने पर भी…
  11. Verse 30तब तो जैसे केवल पहले के संस्कारों से अशुभ वासनाभ्यास उत्पन्न होता है, वैसे ही शुभ वासनाभ्…
  12. Verse 31और वह पुरुषप्रयत्न भी जब अनेक जन्मों के अभ्यस्त एवं दृढ़ीभूत सद्वासना से समन्वित होगा तभी…
  13. Verse 32यही सूचित करने के लिए श्लोक में असदपि” कहा गया है। इसीलिए शास्त्रीय भी अनात्मविषयक भावना…
  14. Verse 33कितु, जब यह अनर्थ अनात्मभावना से ही जनित है, तब भला वह अनर्थ से डरनेवालों द्वारा कैसे सेव…
  15. Verse 34वह एकमात्र तत्त्वदर्शन से भलीभाँति छिन्न हो जाती है, यह कहते है। यह भावना तत्त्वदृष्टि से…
  16. Verse 35आकाश के वर्ण के समान उत्पन्न इस जगत्सम्बन्धी हम लोगों के भरम के परिमार्जन के लिए एकमात्र…
  17. Verses 36–58अथवा, इस प्रकार के भ्रमात्मक ज्ञान का अभाव न हो, क्योकि तत्त्वज्ञान से बाधित वस्तु का संव…
  18. Verse 59"सहस्राणि सहग्रंशो ये रुद्रा अधि भूम्याम्‌" इत्यादि श्रुतियों में प्रसिद्ध रुद्रों की इसी…
  19. Verses 60–61यदि शंका हो कि भिक्षु के सभी स्वप्न संसार सब लोगों द्वारा क्यो नहीं अनुभूत होते ? तो उस प…
  20. Verse 62और उनके (तत्त्वज्ञ के) मिलने में कारण एकमात्र स्थूलता का अभाव ही है, इस आशय से कहते हैं।…
  21. Verses 63–64सम्पूर्ण जीवों के तत्त्वभूत ब्रह्म के साथ ऐक्यलाभ ही ब्रह्म के कल्पित रूपवाले सभी जीवों क…
  22. Verse 65आकाश की नाई चिति की भी सर्वत्र सत्यता है, यह अनुभव से सिद्ध कराते हैं। श्रीरामजी, विभागसह…
  23. Verses 66–67उसके सर्वव्यापी होने ओर वहाँपर सम्पूर्ण पदार्थो की कल्पना करने में दृष्टान्त बतलाते हैं ।…
  24. Verses 68–71वृक्ष आदि में तो छेनी द्वारा किये गये गड्ढे से जनित परिच्छेद है, परन्तु यहाँ पर वह किससे…
  25. Verses 72–75श्रीरामजी, जैसे जल का स्पन्द तरंग हे, वैसे ही चिति का स्पन्द ही जगत हे । (दृष्टान्त एवं द…