Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 60–61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verses 60–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 60,61
संस्कृत श्लोक
यो योऽभितः स जीवस्य संसारः समुदेति हि ।
तत्राप्रबुद्धा जीवौघाः पश्यन्ति न परस्परम् ॥ ६० ॥
मिलन्ति हि मनोबुद्धास्तरङ्गा इव वारिधौ ।
अप्रबुद्धास्तु तन्मात्रनिष्ठा लोष्टवदास्थिताः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि भिक्षु के सभी स्वप्न संसार सब लोगों द्वारा क्यो नहीं अनुभूत होते ? तो उस पर
कहते हैं।
कथित लक्षणवाले जीव के जो-जो संसार चारों ओर उदित होते हैं, उन-उन संसारों में अज्ञानी
जीव-समूह निश्चय ही परस्पर एक-दूसरे को नहीं देख पाते। मन से प्रबुद्ध तत्त्वज्ञ, समुद्र में तरंग की
नाई, जीवों के साथ मिलते ही हैं। और अज्ञानी लोग तो अपने आश्रयमात्र में रहकर मिट्टी के ढेले की
तरह स्थित रहते हैं