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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 14–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verses 14–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 14-27

संस्कृत श्लोक

आत्मनि द्विजभक्तत्वात्सोऽपश्यद्द्विजतामथ । भावाभावविपर्यासे बलवानेव वर्धते ॥ १४ ॥ सामन्ततामवापासौ विप्रः संततचिन्तिताम् । सातत्येन रसः पतिः फलतामेति पादपे ॥ १५ ॥ राज्यार्थं धर्मकार्याणां कर्तृत्वात्सोऽभवन्नृपः । सकामुकतया राजा सुरस्त्रीत्वमवाप ह ॥ १६ ॥ लोला लोचनलोभेन सा मृगी रसशालिनी । बभूव वासनामोहश्चाहो दुःखाय जन्तुषु ॥ १७ ॥ मृगी सा बत चित्तस्था बभूव विपिने लता । अवश्यंभावि लवनं लतिकाऽनुबभूव ह ॥ १८ ॥ अन्तःसंज्ञाचिराभ्यस्तं भ्रमरत्वमथात्मनि । साऽपश्यत्सावमर्देन तदा तद्भावभाविता ॥ १९ ॥ सवारणखुरक्षोदमनुभूयाथ भावितम् । भूयोभूयः प्रबभ्राम महासंसृतिसंभ्रमान् ॥ २० ॥ संसारशतपर्यन्ते रुद्रः सोऽहमहं स्थितः । अस्मिन्संसारसंरम्भे स्वमनोमात्रसंभ्रमे ॥ २१ ॥ एवमत्यन्तचित्रासु संसारारण्यभूमिषु । बह्वीष्वहमतिभ्रान्तस्त्वशून्यास्विव भूरिशः ॥ २२ ॥ कस्मिंश्चिदभवं सर्गे त्वहं जीवटनामकः । कस्मिंश्चिद्ब्राह्मणश्रेष्ठः कस्मिंश्चिद्वसुधाधिपः ॥ २३ ॥ हंसः पद्मवने भूत्वा विन्ध्यकच्छे च वारणः । हरिणो देहयन्त्रादौ दशामहमिमां गतः ॥ २४ ॥ अत्र वर्षसहस्राणि चतुर्युगशतानि च । समतीतान्यनन्तानि दिनर्तुचरितानि च ॥ २५ ॥ मम प्रथममेव प्राक्चलितस्य परात्पदात् । तत्त्वज्ञानितया रूढो भिक्षुत्वे योग्यताक्रमः ॥ २६ ॥ भूयोभूयोऽप्यतिक्रम्य गतश्च ब्रह्महंसताम् । स एव प्राक्तनोऽभ्यासः फलितः संगमोदयात् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

उन्हीं योनियों का कारणप्रदर्शनपूर्वक विस्तार से वर्णन करते हैं। तदनन्तर द्विज में अनुरक्त होने के कारण वह जीवट अपने में द्विजत्व देखने लगा यानी वह द्विज हो गया; क्योकि भाव और अभाव का वैपरीत्य सिद्ध करना हो अर्थात्‌ उद्भूत भावना को अनुद्‌भूत और अनुद्भूत भावना को उद्भूत बनाना हो, तो जो भी वासनासमूह अभ्यास, पाटव आदि से बलवान्‌ (डृढ़ीभूत) होगा, वही इतर का तिरोभाव कर स्वयं कार्यरूप से उत्पन्न होगा ॥ उसके बाद उस ब्राह्मण ने वह सामन्तता (माण्डलिकता) प्राप्त की, जिसका वह सदा चिन्तन कर (=) शास्त्रीय वासनाओं की शिथिलता होने पर अनादि अनर्थ वासनाओं का उद्भव होना अवश्यम्भावी है - यह “जरठवासनः” इस पद से सूचित होता है । रहा था। ठीक ही है, निरन्तर पीया गया पानी वृक्ष मेँ फलरूप से परिणत होता ही है । पश्चात्‌ राज्य के लिए धममनुष्ठान करने से वह राजा (चक्रवर्ती सम्राट्‌) हो गया ओर उसके बाद धर्मसंचय से समन्वित कामुकवृत्ति होने के कारण वह राजा देवांगनारूप बन गया । मृग के लोचन- सौन्दर्य के लोभ से चंचल हुई वह देवांगना रंजित मृगी हो गयी । अहो ! प्राणियों मे वासना-मोह एकमात्र दुःख के लिए ही है | खेद है कि वासनारूप से चित्त मेँ स्थित वह मृगी लता की वासना से अरण्य में लतारूप हो गयी ओर उस लतिका ने यह समझ लिया कि मेरा छेदन अवश्यम्भावी हे । इसके बाद वह लता, जो कि भ्रमर की भावना से भावित थी, छेदन तथा मर्दन से समन्वित लता देह से अपनी देह में भीतरी वासना से चिराभ्यस्त भ्रमरत्व देखने लगी । तदनन्तर वह भँवरा स्वयं भावित हाथी के खुर के आघात का अनुभवकर महासंसार के भ्रमं मे पुनः पुनः (00) घूमने लगा । अपने मनोमात्र से कल्पित इस संसाररूप संभ्रम में सौ जन्म धारण कर वही मेँ भिक्षु रुद्ररूप होकर स्थित हुआ । इस प्रकार अत्यन्त विचित्र, तथा सत्य-सी प्रतीत हो रही अनेक संसाररूप अरण्य-भूमियों मे मैंने अनेक बार दीर्घकाल तक भ्रमण किया । किसी सर्ग में मे जीवटनामधारी हुआ, किसी में मैं विप्र (ब्राह्मण श्रेष्ठ) हुआ तो किसी सर्ग में पृथिवीपति राजा भी हुआ । किसी सर्ग में पद्मवन में हंस होकर विन्ध्य के कच्छ में हाथी ओर हिरन हुआ । इस प्रकार देहरूप यन्त्र में तथा मनोरूपयन्त्र में मैं पूर्व- वर्णित दशा को प्राप्त हुआ । आदि सर्ग से लेकर चिदेकरस परमपद से च्युत हुए मेरे आज तक इस संसार में हजारों वर्ष, सैकड़ों चतुर्युगी एवं अनन्त दिन, ऋतु आदि के चरित बीत गये ओर परम पद से पहले ही विचलित हुए अपनी पूर्व भिक्षुअवस्था में रूढ भी तत्त्वज्ञान के योग्य श्रवण, मनन आदि के अभ्यासरूप योग्यताक्रम का प्रमादवश उल्लंघनकर मैं पुनः पुनः जन्म परंपरा से ब्रह्मदेव का हंस बन गया, वही मैं प्राक्तन अभ्यासक्रम भगवान्‌ रुद्र का सान्निध्य पाने से रुद्ररूप में तत्त्वज्ञानरूप फल के साथ सफल हो गया