Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 68–71
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verses 68–71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 68-71
संस्कृत श्लोक
विद्यते वेदनं दृश्यबन्धो मोक्षस्त्ववेदनम् ।
यदेव रुचिरं ते स्यात्तदेवाशु दृढीकुरु ॥ ६८ ॥
सर्गासर्गौ बन्धमोक्षौ वेदनावेदनात्मकौ ।
अभिन्नौ बोधनाच्चोभौ यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६९ ॥
असंवित्तेस्तु यन्नास्ति तन्नाशे का कदर्थना ।
तूष्णींभावेन यत्प्राप्यं प्राप्तमेवाशु विद्धि तत् ॥ ७० ॥
यद्वै वेदनमात्रात्म तदंगावेदनक्षयम् ।
तद्वेदनं वेदनाया यदिष्टं तत्समाचरेत् ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
वृक्ष आदि में तो छेनी द्वारा किये गये गड्ढे से जनित परिच्छेद है, परन्तु यहाँ पर वह किससे जनित
है ? यदि ऐसी शंका हो, तो उस पर कहते हैं।
अविषय, शुद्ध ब्रह्म में जो विषयता का अन्यथा ज्ञान है, वही "जगत्" इत्याकारक परिच्छेद का
निमित्त होकर स्थित है। चिदेकरस उस ब्रह्य मे जगदाकार जो अचैतन्य अर्थात् जडता है, वह निर्निमित्त
ही है; अतः वह आकाश-जैसे शून्यरूप से स्थित हे । [एवं उस प्रकार का ज्ञान करना ही इसका दृश्य से
बन्ध है और उस प्रकार के ज्ञान की निवृत्ति ही मोक्ष है, यह फलित हुआ।(67-)] श्रीरामजी, ब्रह्म में
अन्यथा ज्ञान ही दृश्यों से बन्ध है ओर अन्यथा ज्ञान न होना ही मोक्ष है । इन दोनों में आपको जो भी
अच्छा लगे, उसे ही शीघ्र दृढ़ कीजिये । सर्ग ओर सर्ग का अभाव एवं बन्ध ओर मोक्ष दोनों क्रमश: वेदन
(अन्यथाज्ञान) तथा अवेदन (अन्यथाज्ञानका अभाव) स्वरूप हे । ये दोनों अपने साक्षिभूत प्रत्यगात्मा
से अभिन्न ही हें । श्रीरामभद्र, अतः आप जैसा चाहें, वैसा करें| श्रीरामजी, एकमात्र न देखने से जो
अपनी सत्ता नहीं रखता, ऐसे अनर्थ के नाश के लिए प्रयास ही क्या है ओर जो सुख निश्चेष्ट होकर
स्थित रहने से पाया जा सकता हे, वह भी शीघ्र प्राप्त ही है; वहाँ भी प्रयास की अपेक्षा नहीं है, यह आप
जानिये हे राघव, जो जगद्रूप एकमात्र अन्यथाज्ञानस्वरूप है, निश्चित है कि वह उस प्रकार का ज्ञान न
करने से क्षीण हो जाता है। उस जगद्रूप वेदना का साक्षीरूप जो प्रत्यकृचैतन्य है, वह प्राप्त ही हे । अतः
आपको जो इष्ट हो, उसे कीजिए