Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 5–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verses 5–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 5-9
संस्कृत श्लोक
रुद्रस्त्वनुत्तमज्ञानविलासैकतया तया ।
स्वप्नशेषं च वृत्तान्तमपश्यत्प्राक्तनं धिया ॥ ५ ॥
निरावरणविज्ञानवपुः स भगवांस्तदा ।
उवाच स्वयमेकान्ते स्वस्वप्नशतविस्मितः ॥ ६ ॥
अहो तु चित्रा मायेयं तता विश्वविमोहिनी ।
असत्यैवापि सद्रूपा मरुभूमिषु वारिवत् ॥ ७ ॥
इति प्रथममाज्ञातं चिद्योऽहं चित्ततां गतः ।
सर्वसंपन्नसर्वज्ञगगनादिविभावनात् ॥ ८ ॥
यदृच्छया स्थितो जीवो भूततन्मात्ररञ्जितः ।
कस्मिंश्चिदभवत्सर्गे भिक्षुरक्षुभितोऽभितः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
सारूप्य मुक्ति में यद्यपि जगत् का संहार आदि करने का अधिकार नहीं हैः तथापि ज्ञान, ऐश्वर्य
आदि से प्रसिद्ध रुद्रभगवान् का साम्य तो है ही, इस आशय से कहते है।
वहाँ पर परम श्रेष्ठ ज्ञान एवं एश्वर्य आदि के विलासो से प्रसिद्ध रुद्र भगवान् के साथ समता-
विशिष्ट उस अलौकिक बुद्धि से उस रुद्र ने अपने पूर्वतन सम्पूर्ण वृत्तान्तो का भी अवलोकन कर
लिया । उस समय आवरणरहित, एकमात्र ज्ञानाकार भगवान् रुद्ररूप उसने, अपने सैकड़ों स्वप्नो से
आश्चर्यचकित होते हुए अपने मन में ही कहा : यह महान् आश्चर्य है कि चारों ओर फैली हुई यह माया
विश्व को मोहित करनेवाली है । मरूभूमि में जल की नाई यह स्वयं असद्रूपा ही है; फिर भी सद्रूप-सी
भासित हो रही है । आ ! मुझे स्मरण आ गया कि सर्वप्रथम प्राक्तन पारमार्थिक स्थिति से मैं चिद्रूप ही
था । तदनन्तर मायावश चित्तरूपता को ("एकोऽहं बहु स्यां प्रजायेय" इत्याकारक सृष्टिसंकल्प वृत्तिता
को) प्राप्त हुआ । उस तरह के संकल्प से ही मैं सम्पूर्णरूप से संपन्न होता हुआ चिदंश में सर्वज्ञ ओर
गगन आदि की भावना से जडांश में गगन आदि विभागवान् भी हो चुका हू । तदनन्तर मेरा स्वेच्छा से
व्यष्टि-समष्टयात्मक लिंगदेह में चिदात्मरूप से प्रवेश होने पर-स्थूलभूतों तथा सूक्ष्मतन्मात्राओं से
और उन देहोँ से अभेदाध्यास होने के कारण-तद्गत वासनाओं के वैचित्र्य से चित्रपट की नाई रंजित
होता हुआ मैं जीवरूप होकर स्थित हुआ । ओर अनादिकाल से जन्म-परम्पराओं का अनुभव कर रहा
वह जीव भी किसी एक सर्ग में वेराम्य एवं समाधि में पटुता होने के कारण चारों ओर से विषयों के क्षोभ
से रहित होता हुआ संन्यासी हो गया