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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

रुद्रभूतवपुस्तत्र तनुं तत्याज तामसौ । गन्धः पवनतां गच्छन्कुसुमस्तबकं यथा ॥ ३ ॥ स रुद्रो रुद्रभवने विजहार यथेच्छया । तैस्तैः शिवपुराचारैर्गणकोटिगरिष्ठया ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

हंस का यह रुद्रदेहधारण जन्मान्तर नहीं है, किन्तु अवशिष्ट प्रारब्ध से उपनीत इच्छा के कारण योगियो के समान मानस देहान्तर की कल्पना द्वारा पूर्व देह का त्यागमात्र ही है, इस आशय से कहते हैं । वहाँ पर उस हंस ने (रुद्रभावनावश) रुद्रशरीर धार कर अपने उस पूर्ववर्ती हंस शरीर का उस प्रकार त्याग कर दिया जिस प्रकार गन्ध पवनरूपता को प्राप्त कर पुष्प गुच्छों का त्याग कर देती हे । वह रुद्र उस रुद्रभवन में गाणपत्यपद की प्राप्ति के कारण उन-उन शिवपुर के आचारो से यथेच्छ विहार करने लगा