Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
भावनैव स्वमात्मानं देहोऽयमिति पश्यति ।
असत्तामात्रविस्तारं गुल्मकत्वमिवाङ्कुरः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
कितु, जब यह अनर्थ अनात्मभावना से ही जनित है, तब भला वह अनर्थ से डरनेवालों द्वारा कैसे
सेवनीय है 2 इस आशय से कहते है।
यह भावना ही अपनी आत्मा को “यह देह है" इस प्रकार ऐसे देखती हे, जैसे अंकुर एकमात्र असद्रूप
विस्तार से युक्त शाखा-प्रशाखावाली लतारूपता को देखता है