Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 72–75
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verses 72–75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 72-75
संस्कृत श्लोक
वीचिर्यथाम्भसः स्पन्दो जगच्चैव तथा चितौ ।
एतावन्मात्र एवात्र भेदो यद्रघुनन्दन ॥ ७२ ॥
देशकालस्वरूपेषु सत्सु वीच्यादिताम्भसि ।
जगदादौ तु देशाद्या असन्तो जगतीक्षिताः ॥ ७३ ॥
आभास्वरं त्रिजगदित्यतिभाति भास्वत्स्वं वेदनं विदनमेव चितेः स्वरूपम् ।
वाचि स्थितं भवति चैतदुपोह भेदक्लिष्टं प्रशान्तवचनस्तु शिवः परात्मा ॥ ७४ ॥
संवेदनं सर्वं इतीह शब्दादर्थादभिन्नौ न कदाचिदेतौ ।
वीच्यम्भसी द्वे इति नोचितोक्तियस्याज्ञतायां त्विदमेव युक्तम् ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, जैसे जल का स्पन्द तरंग हे, वैसे ही चिति
का स्पन्द ही जगत हे । (दृष्टान्त एवं दाष्टान्तिक में जो विलक्षणता है, उसे दिखलाते हैं।) हे रघुनन्दन,
यहाँ पर (दृष्टान्त एवं दार्ष्टान्तिक में) इतनी ही ओर विलक्षणता है कि देश और काल के स्वरूपो की
स्थिति रहते ही जल मेँ तरंग आदिरूपता देखी गयी है और यहाँ जगद्रूप विवर्तं के उपादान ब्रह्म में तो
देश आदि पहले न रहते हुए बाद में आरोपित हुए ही कार्यरूप जगत्कोटियो में देखे गये हैं श्रीरामजी,
स्वप्रकाश आत्मरूप जो चैतन्य है, वही अविद्या के आवरण से थोडे प्रकाश-सा सम्पन्न तीनों
जगत्स्वरूप अन्यथा प्रतिभासित होता है । चिद्रूप-जो कि उसका पारमार्थिक स्वरूप है - ज्ञान ही हे,
न कि जड । भेद से क्लिष्ट इन तीनों जगत् का आप “अन्नेन सोम्य शुगेनाऽऽपो मूलमन्विच्छ" (हे
सौम्य, अन्नरूप कार्य से जलरूप कारण खोज लो) इत्यादि श्रुतियों मे दर्शित उपायों से उपसंहार कर
दीजिये। उस प्रकार उपसंहृत हुआ वह "वाचा रम्भणं विकारो नामधेयम्" इस श्रुति द्वारा दर्शित रीति के
अनुसार वाणी में ही स्थित होता है । वाणी जहाँ बिलकुल शांत हो चुकी है, ऐसा वह परम शिव ही
परमात्मा है । श्रीरामभद्र, आत्मचिति और सम्पूर्ण जगत्-ये दोनों शब्दतः ओर अर्थतः अभिन्न ही है,
कभी भी इन में द्वैत संभव नहीं है । उक्तस्वरूप आत्मा की अज्ञता-दशा में ही द्वैतज्ञान युक्त है, ज्ञान-
दशा में तो वीचि ओर जल ये दोनों भिन्न हैं, यह उक्ति युक्त नहीं हे