Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
सर्वप्रपञ्चभूतानि यथानुभवसीह हि ।
तथेह सर्वभूतात्म चित्त्वं सर्वत्र विद्यते ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश की नाई चिति की भी सर्वत्र सत्यता है, यह अनुभव से सिद्ध कराते हैं।
श्रीरामजी, विभागसहित सम्पूर्ण पंचभूतों का जैसे आप सर्वत्र अनुभव करते हैं, वैसे ही यहाँ भी
सम्पूर्ण भूतसत्तारूप चितितत्त्व ही सर्वत्र विद्यमान है इसका भी आप अनुभव कीजिये