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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 36–58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, verses 36–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 36-58

संस्कृत श्लोक

असन्मयीस्वरूपैषा परं सत्तैव लालनी । वर्तते चेद्विनोदाय किंचित्सा न करिष्यति ॥ ३६ ॥ तत्तान्सर्वान्स्वसंसारानुत्थायालोकयाम्यहम् । सम्यगालोकदानेन तेभ्य एकीकरोम्यहम् ॥ ३७ ॥ इति संचिन्त्य रुद्रोऽसौ तं सर्गं प्रजगाम ह । यत्र भिक्षुर्विहारस्थः सुप्तः शव इव स्थितः ॥ ३८ ॥ बोधयित्वाथ तं भिक्षुं चेतसा चेतनेन च । योजयामास सस्मार भिक्षुरप्यात्मनो भ्रमम् ॥ ३९ ॥ रुद्रमात्मानमालोक्य जीवटादिमयं तथा । बोधादविस्मयार्होऽपि स भिक्षुर्विस्मयं ययौ ॥ ४० ॥ अथ रुद्रस्तथा भिक्षुर्द्वावेवोत्थाय जग्मतुः । क्वापि जीवटसंसारं चिदाकाशैककोणगम् ॥ ४१ ॥ तत्र तद्भवनं गत्वा तद्द्वीपं तच्च मण्डलम् । विषयं तत्पुरं तच्च तं च पाणावसिग्रहम् ॥ ४२ ॥ सुप्तं ददृशतुर्नष्टसंज्ञं जीवटकं शवम् । स्थापयित्वा वपुर्भावं प्रभान्तं भवभूमिषु ॥ ४३ ॥ तं प्रबोध्य नियोज्याशु चेतसा चेतनेन च । एकरूपास्त्रिरूपास्ते रुद्रजीवटभिक्षुकाः ॥ ४४ ॥ बोधवन्तोऽप्यबुद्धाभा विस्मिता अप्यविस्मिताः । बभुस्तूष्णींस्थिताश्चित्रकृताकारा इव क्षणम् ॥ ४५ ॥ अथ जग्मुश्च ते सर्वे क्वचिद्व्योमनि संस्थितम् । विप्रसंसारमारब्धं परिभूतसघुंघुमम् ॥ ४६ ॥ ते तत्र भुवनं गत्वा तद्वीपं तच्च मण्डलम् । विषयं तच्च तं ग्रामं प्रापुस्तं ब्राह्मणालयम् ॥ ४७ ॥ विप्रं ते ददृशुः सुप्तं कलत्रवलितं गृहे । कण्ठे गृहीतं ब्राह्मण्या बहिर्जीवमिव स्थितम् ॥ ४८ ॥ तं प्रबोध्य नियोज्याशु चेतसा चेतनेन च । तत्स्थास्ते बहवोऽप्यन्ये सविस्मयविविस्मयाः ॥ ४९ ॥ अथ जग्मुश्चिदाकाशकचितं चेतितं चितेः । सामन्तं नृपसंसारं भ्रमणाभोगसुन्दरम् ॥ ५० ॥ ततस्ते भुवनं प्राप्तास्तद्द्वीपं तच्च मण्डलम् । सामन्तं ददृशुर्मत्तं सुप्तं पर्यङ्कपङ्कजे ॥ ५१ ॥ हेमावदातं हेमांग्या निहितं कुचकोटरे । भ्रमर्येवान्वितं पद्मकोशसुप्तं मधुव्रतम् ॥ ५२ ॥ कान्ताभिरभ्यावलितं मञ्जरीभिरिव द्रुमम् । दीपजालकमध्यस्थं रत्नौघ इव काञ्चनम् ॥ ५३ ॥ तं प्रबोध्य नियोज्याशु चेतसा चेतनेन च । तत्स्थास्ते बहवोऽप्येके सविस्मयविविस्मयाः ॥ ५४ ॥ अथ ते राजसंसारं जग्मुस्तत्र विबोध्य तम् । चेतसैवमथान्यासु भ्रेमुः संसारभूमिषु ॥ ५५ ॥ प्राप्य तां ब्रह्महंसेहां रुद्रतां सर्व एव ते । समाजग्मुर्विरेजुश्च रुद्राणामुत्तमं शतम् ॥ ५६ ॥ एकसंविद्भिन्नतनु चित्रचेष्टितवेष्टितम् । एकरूपमनेकाभं रूपं तत्पारमेश्वरम् ॥ ५७ ॥ रुद्राणां तच्छतमथ निरावरणचिन्मयम् । सर्वसंसारसंबन्धि स्थितं सर्वजगत्स्थितम् ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा, इस प्रकार के भ्रमात्मक ज्ञान का अभाव न हो, क्योकि तत्त्वज्ञान से बाधित वस्तु का संवेदन होनेपर भी - रज्जु में बाधित सर्प की नाई भय उत्पन्न करने में असमर्थ होने के कारण - वह अनर्थ का जनक नहीं हो सकता, प्रत्युत क्रीडा का एक साधन ही होगा। बाधित होने से असद्रूप, अधिष्ठानसत्तास्वरूप यह जगदाकार भावना, जो कि एकमात्र कौतुक का साधन हे, यदि प्रातिभासिक सत्ता के कारण है, तो वह विनोद के लिए ही है । वह अणुमात्र भी अनर्थ की जननी न होगी । इसी कौतुकवश मैं नाना प्रकार के अपने उन संसारो को जाकर देखता हू । और उन्हें तत्त्वज्ञान के प्रदान द्वारा उपाधि से पृथग्भूत अपनी आत्मा को एक कर देता हूँ। इस प्रकार विचारकर यह रुद्र उस सर्ग मे चला गया, जहाँ मठ स्थित भिक्षु, मृतक की नाई, निद्रा में स्थित था। तदनन्तर उस रुद्र ने उस जीवटनामधारी भिक्षु को जागृतकर स्वचित्तांश चित्त एवं अपने अंशभूत चिदाभासस्वरूप तत्त्वज्ञ जीव से संयुक्त किया । और वह भिक्षु भी अपने भ्रम का स्मरण करने लगा (7)) । अपने-आपको रुद्ररूप तथा जीवट आदि के शरीररूप में भी देखकर तत्त्वज्ञान होने के कारण आश्रय करने के अयोग्य भी वह भिक्षु (इतने थोडे समय में चिरकाल के जन्मों के अनुभवरूप तथा स्वाप्निक रुद्रशरीरादि की अनुवृत्तिरूप आश्चर्य के अवलोकन से) आश्चर्यचकित हो गया । तदनन्तर वह रूद्र और भिक्षु दोनों ही उठकर चिदाकाश के एक कोने में स्थित कहीं ब्रह्माण्डान्तर में चले गये उस जीवट के संसाररूप ब्रह्माण्डान्तर में लीलोपाख्यान में वर्णित रीति से प्रवेशकर उसके भूलोक में जाकर वहाँ भी उस जीवट के स्थानभूत द्वीप को और उस मण्डल को, उस मण्डल के अन्तर्गत देश को, उस पुर को ओर उस घर को तथा उस घर में स्थित हाथ में तलवार धारण किये हुए जीवट को उन दोनों न देखा, जो कि शव की नाई सुस्त ओर नष्टसंज्ञ होकर पडा था । वहाँ पर स्थित लोगों के लिए स्वयं दर्शन के अयोग्य होने के कारण रुद्र एवं भिक्षु के शरीर के भाव को (जीवटबोधनाभिप्राय को) तथा रुद्र के कोटिसूर्य के समान प्रभा के अन्तरूप सम्पूर्ण अपने प्रभाव को अन्तर्धानशक्ति से छिपाकर वे जीवट के संसृति प्रदेशों में पहुँचे और वहाँ उस जीवट को जगाकर शीघ्र ही उसे स्वचित्तांश चित्त से एवं स्वांशचिदाभासरूप तत्त्वज्ञ जीव से संयुक्त बनाकर के भीतर एकस्वरूप ओर बाहर तीन रूपवाले वे रुद्र, जीवट तथा भिक्षु तत्त्वदर्शन हो जाने से परमार्थतः तत्त्वज्ञ होते हुए भी अज्ञानी एवं विस्मयरहति होते हुए भी विस्मय से चकित होकर चित्रलिखित पुरुषों के समान क्षणभर तक चुपचाप स्थित रहे । उसके बाद वे तीनों चिदाकाश में कहीं अध्यस्त, चारों ओर प्राणियों से शब्दायमान और जीवट के चित्त के परिणामस्वरूप विप्र के संसार में चले गये । लीलोपाख्यान में वर्णित रीति से वे उस भूलोक में जाकर विप्र के स्थानभूत द्वीप में ओर उसके मण्डल में, मण्डलान्तर्गत देश एवं उस ग्राम में तथा वहाँपर भी उस ब्राह्मण के घर पहुँचे । उस ब्राह्मण के घर में अपने पोष्यवर्गो से समन्वित, बाहर निकले हुए प्रियतम प्राणकी नाई स्थित तथा ब्राह्मणी द्वारा कण्ठप्रदेश मे आलिंगित सोये हुए उस ब्राह्मण को उन लोगों ने देखा । उसे जगाकर और स्वचित्तांश चित्त एवं स्वांशचिदाभासस्वरूप तत्त्वज्ञ जीव से शीघ्र संयुक्तकर वहाँ पर वे ओर बहुत से दूसरे भी परमार्थतः विस्मयरहित होते हुए भी आश्चर्यचकित होकर स्थित हुए । तदनन्तर उन लोगों ने (रुद्र, भिक्षु, जीवट और ब्राह्मण ने) चिदाकाश में शोभित, चित्ताकार से विवृत्त चिति के परिणामस्वरूप और भ्रमण तथा सर्वविध भोगों से रमणीय सामन्त रूप राज-संसार के लिए प्रस्थान किया। पश्चात्‌ वे सब उस सामन्त के भूलोक को, उसके द्वीप को तथा उसके मण्डल को पहुँच गये । वहाँ पर उन्होने पलंगरूप कमल पर सोये हुए मदयुक्त उस मण्डलाधीश को देखा । वह सामन्त सुवर्ण के समान देदीप्यमान (50) प्रस्तुत श्लोक से यह सूचित होता है कि रुद्रांश जीवों के प्रवेश की कल्पना, उनका सत्यसंकल्प एवं विचित्र भोगों के जनक अवशिष्ट अदृष्ट के बल से बाधित हुए भी जीवट से लेकर रुद्रपर्यन्त सभी शरीरो तथा उनके प्रपंचो की कल्पपर्यन्त अनुवृत्ति हो सकती है, इस लिए भिक्षु के जागरण से हम लोगों के स्वाप्निक प्रपंच की नाई उन शरीरो एवं उनके प्रपंचो का निरनुवृत्तिरूप बाध नहीं होगा । देहवाला था । सुवर्णागी पटरानी द्वारा अपने कुचरूप कोटर में वह ऐसा आलिंगित था, जैसे भ्रमरी से आलिंगित कमलकोश में सोया हुआ भँवरा । जैसे मंजरियों से वृक्ष वेष्टित रहता है, वैसे ही वह सामन्त अनेक रमणियों से वेष्टित था। और दीपकों के समूहों के बीच वह ऐसा स्थित था, जैसे रत्न समूहों के बीच सुवर्ण । (इस प्रकार उस सामन्त को देखकर) उन सों ने उसे जगाकर और अपने चित्त एवं तत्त्वज्ञ जीव से शीघ्र संयुक्त बनाकर के वे रुद्र आदि तथा अन्य भी बहुत से वहाँ पर स्थित जन विस्मयरहित होकर भी विस्मय से युक्त हुए । तदनन्तर वे चक्रवर्तीं राजा के संसार में गये और उसे जगाकर अपने चित्त एवं चेतन से संयुक्त किया। इस प्रकार उसे रुद्ररूप बनाने के बाद आतिवाहिक देह से ही अन्य संसारभूमियों में उन लोगों ने भ्रमण किया (%) अन्त में वे सभी ब्रह्मदेव के हंसरूप वासना से युक्त चित्त के परिणामस्वरूप ब्राह्महंस के संसार में पहुंचकर रुद्ररूप हो गये। इस प्रकार रुद्र के चित्त एवं चेतन के अंशों से ही चित्त एवं चेतन से युक्त होने से तथा ज्ञान, एश्वर्य आदि से सम्पन्न होने सेवे उत्तम शतरुद्ररूपता को प्राप्त हुए तथा शोभित होने लगे । परमेश्वर सम्बन्धी वह रुद्र का रूप ज्ञान से तो एक है, पर शरीर से भिन्‍न-भिनन हैं, चित्रविचित्र चेष्टाओं से वेष्टित है, एकरूप भी है और अनेकरूप भी है। तदनन्तर प्रातिभासिक संसार के आधारभूत, सम्पूर्ण जगत्‌ ओर उसके भीतर स्वयं अन्तर्यामीरूप से स्थित वे शतरुद्र आवरणशून्य चैतन्यरूप होकर स्थित हुए