Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 55
चौवनवाँ सर्ग समाप्त प्रचपनवाँ सर्ग देह का नाश हो जाने पर भी अविनाशी आत्मा मूढ़ और तत्त्वज्ञ दोनों में समान है, परन्तु भ्रान्ति से मूढ़ जन्मादि का भागी बनता है और तत्त्वज्ञानी नहीं बनता - यह वर्णन ।
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- Verse 1श्रीभगवान ने कहा : हे पार्थ, बुद्धिमान् देहधारण के निमित्तभूत अन्नपानादिरूप भोगों का त्य…
- Verse 2इसी तरह देहात्मभावना (देह में आत्मा की भावना ) भी न करे, यह कहते हैं। हे अर्जुन, जन्मादिव…
- Verse 3हे महावाहो, देह का नाश होने पर इसका कुछ भी नष्ट नहीं होता । आत्मा का नाश होने पर इसका कुछ…
- Verse 4उक्त अर्थ में 'अशीर्यो नहि शीर्यते“ इस श्रुति को प्रमाणरूप से उपस्थित कर रहे भगवान् शीर्…
- Verse 5मन के अज्ञता से युक्त रहने पर ही आसक्ति होती है, जिसे कर्तृत्व कहते हैं। वह आसक्ति कर्म न…
- Verses 6–8उसमें उपाय बतलाते हैं। परम तत्त्वज्ञान का आश्रय करने के कारण आसक्तिरहित हुए महात्मा में,…
- Verse 9ऐसी परिस्थिति में मूढ़ लोग आत्मबुद्धि से देहादि का अवलोकन किया करें, तथापि देहादि का नाश…
- Verse 10नहीं होता, क्योंकि जब आत्मा अविनाशात्मा ही है, तब भला उसका कहाँ क्या विनष्ट हो सकता है ?…
- Verse 11तव मूर्खो को देहनाश, पुत्रलाभ आदि में अनर्थत्व और अर्थत्व का व्यवहार कैसे होता है ? इस पर…
- Verse 12अतएव मैंने पहले ही कह दिया था कि सत् भाव का असत्त्व के साथ विरोध होने से देहादि में सत्व…
- Verses 13–14इस तरह जो सद्वस्तु है, वह अविनाशी है ओर जो विनाशी है, वह असरूप ही है, इसलिए असद्रूप बन्धु…
- Verses 15–16अद्रय होने के कारण उसके विनाशकर्ता की अप्रसिद्धि से भी आत्मा के नाश की प्रसक्ति नहीं हे,…
- Verse 17यो अपरिच्छिन्न आत्मा के मरणादि-परिच्छेद और दुःखादि-भ्रम मे हेतु क्या है ? अर्जुन ने कहा :…
- Verse 18“एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति“ इस श्रुति का तात्पर्य लेकर भगवान् समाधान…
- Verse 19उस जीव के विचित्र देहो के परिग्रह तथा उन भिन्न-भिनन्न देहो के अनुरूप होनेवाली विचित्र च…
- Verses 20–21पूर्व देह से दूसरी देह में जाने में वासना ही निमित्त है, यह कहते हैं। देश और काल से जर्जर…
- Verses 22–24अतएव इसका स्थूलदेह भी वासनात्मक ही है, परन्तु चिरकालिक अनुवृत्ति से उसमें स्थूलता का भ्रम…
- Verses 25–28लोक में वही मरणरूप से प्रसिद्ध है, यह कहते है। हे कौन्तेय, शरीर से जीव के निकल जाने पर दे…
- Verse 29जव प्रतियोगी ही वासना से कल्पित हैं, तब उनके नाश भी वासना कल्पित हैं, यह सृष्टि के आरम्भ…
- Verse 30उत्पत्ति-काल में वासनामय जगत् भले ही मिथ्याभूत हो, परन्तु स्थितिकाल में अर्थक्रियासमर्थ…
- Verse 31देहादि आकार भले ही वासनामय हों, उससे प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते है । पार्थ, पहले का…
- Verse 32यदि शंका हो कि ज्ञान के निमित्त प्रयत्न कर रहे बहुत से लोगों का प्रयत्न पहले काम, क्रोध आ…
- Verse 33अतएव शास्त्रीय प्रयत्नो मे दढ अभिनिवेश करना चाहिए, यह कहते है। इसलिए विन्ध्याचल के फूटने…
- Verse 34शास्त्रीय प्रयत्नो के मन्द हो जाने पर पूर्ववासना ओके वैचित्र्य से सुखदुःखात्मक अनर्थोकी प…
- Verse 35उसी आशय को अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्ग वा नरक तु…
- Verse 36दूसरा कोई कारण तो संभव नहीं है । ईश्वर, काम, कर्म आदि भी वासना के अनुसार ही सुखदुःख आदि प…
- Verse 37वासना के मूल को जानने की इच्छवाले अर्जुन पूछते हैं। अर्जुन ने कहा : हे देवदेवेश, यह वासना…
- Verse 38उसमें तुम्हें विचार से आत्म-स्वरूप का परिचय तो हो गया है, अब तुम्हारे लिए उसकी ढता से देह…
- Verses 39–40वासनामय ही लिंग शरीर है और उसमें प्रतिबिम्बस्वरूप जीव भी वासना से ही उत्पन्न है अतः वासना…
- Verses 41–42(तुम्हारे द्वारा उद्भावित उपर्युक्त) दोष तव होता जव प्रतिविम्बमात्र संसारी जीव है ओर वह…
- Verse 43और वही समूलवासना-निवृष्ति देहधारणपर्यन्त “जीवन्मुक्ति इस नाम से प्रसिद्ध है, उसका इसी लोक…
- Verse 44वह मोक्ष न कर्मो से प्राप्त किया जा सकता है और न बाह्य विषयों के पाण्डित्य से ही प्राप्त…
- Verse 45कहे गये समाधान का संक्षेप से उपसंहार करते है । पार्थ, अपनी ही माया से आच्छादित हो जाने के…