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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

यो न निर्वासनो नूनं सर्वधर्मपरोऽपि सः । सर्वज्ञोऽप्यभितो बद्धः पञ्जरस्थो यथा खगः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

वह मोक्ष न कर्मो से प्राप्त किया जा सकता है और न बाह्य विषयों के पाण्डित्य से ही प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु एकमात्र आत्मज्ञान से ही पाया जा सकता है, इस आशय से कहते हैं। जो वासना से निर्मुक्त नहीं है, भले ही वह समस्त धर्मो मे परायण क्यों न हो, सर्वज्ञ यानी समस्त बाह्य विषयों का पण्डित ही क्यो न हो, फिर भी उस प्रकार वह चारों ओर से बद्ध है, जिस प्रकार पिंजरे में स्थित पंछी