Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
स कृष्यते वासनया रज्वेव पशुपोतकः ।
स तिष्ठति शरीरान्तः पञ्जरे विहगो यथा ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उस जीव के विचित्र देहो के परिग्रह तथा उन भिन्न-भिनन्न देहो के अनुरूप होनेवाली विचित्र
चेष्टाओं में निमित्त कहते हैं।
वह जीव वासना से इस तरह खींचा जाता है, जिस तरह रस्सी से बछड़ा। वह शरीर के अन्दर उस
तरह बैठा रहता है, जिस तरह पिंजड़े में पक्षी