Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच । किमुत्था देवदेवेश क्षीयते वासना कथम् । श्रीभगवानुवाच । मौर्ख्यमोहसमुत्थाना त्वनात्मन्यात्मभावना । आत्मज्ञानान्महाबोधाद्विलयं याति वासना ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

वासना के मूल को जानने की इच्छवाले अर्जुन पूछते हैं। अर्जुन ने कहा : हे देवदेवेश, यह वासना किससे उत्पन्न हुई यानी इसका मूल क्या है और वह किस प्रकार नष्ट होती है ? अज्ञान ही उस वासना का मूल है और ज्ञान से ही उसका समूल नाश होता है, यो भगवान्‌ कहते हैं । श्री भगवान ने कहा : अनात्मभूत वस्तु में आत्मभावनारूप यह वासना अज्ञानस्वरूप मोह से उत्पन्न हुई है ओर महाबोधस्वरूप आत्मज्ञान से तो यह (वासना) विलय को प्राप्त हो जाती है