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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच । नरकस्वर्गसर्गादिसंभ्रमेषु जगत्पते । किमस्य कारणं ब्रूहि जीवस्य जगतः स्थितेः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी आशय को अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्‌ स्वर्ग वा नरक तु वा॥ (अपने सुख-दु:खों मे पराधीन, अज्ञानी यह जीव ईश्वर से प्रेरित होकर ही स्वर्ग या नरक में जाता है ) इस व्यास-वाक्य आदि में प्रसिद्ध कारणान्तर की आशंका के निरास के साथ स्पष्टरूप से जानने की इच्छा कर रहे अर्जुन पूछते हैं। हे जगदीश, जगत्‌ की स्थिति में निमित्तभूत इस जीव का स्वर्ग, नरक, सृष्टि आदि में जो भ्रमण होता है, उसमें कारण क्या है ? यह आप मुझसे कहिए